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यूपी : श्राद्ध पर पितरों को भोग लगाने के लिए नहीं दिख रहे कौवे, पर्यावरणविदों ने जताई चिंता

Mon, 16 Sep 2019 07:29 PM IST
गीतार्जुन गौतम पियूष तिवारी, अमर उजाला, वाराणसी
पियूष तिवारी, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Mon, 16 Sep 2019 07:29 PM IST
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Crows are not seen to offer ancestors to Shraddh varanasi
कौआ। - फोटो : सोशल मीडिया

श्राद्ध कर्म में कौवों को श्रद्धा का प्रतीक माना गया है। पितृ पक्ष में पितरों को भोग लगाने के लिए कौवे की तलाश की जा रही है। श्रद्धालु कौवे को खोजने के लिए छतों से लेकर घाटों तक घूम रहे हैं लेकिन कौवे इन दिनों दिख नहीं रहे हैं। कौवों की इस घटती संख्या को देखते हुए पर्यावरणविद भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में ही सरंक्षण को लेकर कोई उपाय नहीं किया गया तो यह भी विलुप्त हो जाएंगे।

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सुबह जगते ही कौवों की कांव कांव अब नहीं सुनाई देती। पेड़ों की हो रही अंधाधुंध कटाई, बढ़ते कंक्रीट के जंगल का असर पर्यावरण पर तो पड़ ही रहा है, पशु पक्षी भी प्रभावित हो रहे हैं। रसायन युक्त खान पान और लगातार खेतों में हो रहे रसायनों के प्रयोग से पशु पक्षियों का जीवन चक्र भी प्रभावित हो रहा है। इसका असर पक्षियों में गौरैया और कौवों पर देखने को मिल रहा है। गौरैया को तो लोगों ने संरक्षण करना शुरू कर दिया लेकिन कौवों की जनसंख्या लगातार कम होती चली जा रही है। यही स्थिति रही तो कौवे भी गिद्घ की तरह गायब हो जाएंगे।
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श्राद्ध में कौवों का महत्व :
ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्रा के अनुसार कौवा यम का प्रतीक है, जो दिशाओं का फलित( शुभ- अशुभ संकेत बताने वाला) बताया गया है। इसीलिए श्राद्ध का एक अंश इसे भी दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में कौवों का बड़ा ही महत्व है, श्राद्ध पक्ष में कौआ यदि आपके द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण कर ले, ऐसा माना जाता है कि पितरों की कृपा आपके ऊपर है, पितृ प्रसन्न हैं, इसके विपरीत यदि कौआ भोजन करने नहीं आये तो यह माना जाता है, कि पितर विमुख हैं या नाराज हैं। भारतीय मान्यता के अनुसार व्यक्ति मरकर सबसे पहले कौवे के रूप में जन्म लेता है और कौवे को खाना खिलाने से वह भोजन पितरों को मिलता है।

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कौवे को माना गया देव पुत्र :
मान्यता के अनुसार पुराणों में कौवे को देवपुत्र माना गया है। इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौवे का रूप धारण किया था। त्रेतायुग में जब भगवान राम ने अवतार लिया और जयंत ने कौवे का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारा था। तब भगवान राम ने तिनके का बाण चलाकर जयंत की आंख फोड़ दी थी। जब उसने अपने किये की माफी मांगी। उस समय राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया भोजन पितरों को मिलेगा। तभी से श्राद्ध में कौवों को भोजन कराने की परंपरा चली आ रही है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में कौवों को ही पहले भोजन कराया जाता है।

प्रजनन क्षमता हुई है प्रभावित :
बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर और पर्यावरणविद डॉ. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि इसके पीछे कई कारण हैं। इसमें एक तो पेड़ों की कटाई तो है ही, क्योंकि ये पेड़ों की खोह में ही अपना घोसला बनाते हैं। वहीं दूसरा फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए उपयोग किए जा रहे कीटनाशकों से वे खेतों में पानी पीने के चलते उनका प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है।

मुख्य वन मंडलाधिकारी केके पांडेय ने बताया कि कौवा पर्यावरण के लिए बहुत ही जरूरी पक्षी है। बदलते परिवेश से कौवे अब शहरों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों विशेष में समूह में सिमट गए हैं। इनकी संख्या कम होती जा रही है। वन विभाग ने कभी इनकी गणना तो नहीं कराई है, लेकिन इसके लिए शासन को पत्र लिखकर इनके संरक्षण को लेकर चर्चा की जाएगी।

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