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सुरसरी तट पर ओडिसी नृत्य की हुई प्रस्तुति
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वाराणसी। उत्तर प्रदेश और उड़ीसा की संस्कृति मंत्रालय की ओर से आयोजित सागर गंगा महोत्सव में दो प्रदेशों की संस्कृति सोमवार की शाम को देखने को मिली। अस्सी घाट पर सुबह-ए-बनारस के मंच पर आयोजित कार्यक्रम में जगन्नाथपुरी के भक्तों ने प्रस्तुति दी। इस दौरान हुए कुमारी सस्मिता बेहेरा के ओडिसी नृत्य की एकल प्रस्तुति हुई, इसमें पहली प्रस्तुति बसंत पल्लवी, आईगिरी नंदिनी से किया। समापन वृदावन का कृष्ण कन्हैया से किया। जिसे देख दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। वहीं बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय की डॉ. सुप्रिया शाह ने सितार वादन में अपनी प्रस्तुति में राग पूरिया कल्याण में अलाप जोड़ झाला बजाया। इसके बाद मशीत खानी गत, एक ताल में द्रुत गत और अति द्रुत तीन ताल में बंदिश और झाला बजाकर भाव विभोर कर दिया। इनके साथ तबले पर पं. ललित कुमार ने संगत किया। कार्यक्रम में पद्मश्री डॉ. सोमा घोष ने इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर सभी कलाकारों का उत्साह वर्धन करते हुए सभी को सम्मानित किया। कार्यक्रम में बीएचयू के छात्राओं ने भी सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति देकर समा बांध दिया।
वाराणसेय उत्कल समाज की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सबसे पहले दशाश्वमेध घाट से नौका पर सवार होकर 600 से अधिक भक्त अस्सी पहुंचे। जहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं का माल्यार्पण कर पूजन किया। महोत्सव की अध्यक्षता के रूप में प्रतिनिधि के रूप में डॉ. टीएम महापात्रा ने की। गोष्ठी में बोलते हुए डॉ. विजय रामानुज ने बताया कि नित्य पवित्र गंगा की लीलाओं को देखकर सागर भी मुखर हो उठा है। प्रो. श्याम गंगाघर वापट ने कहा कि काशी शिव और गंगा की पौराणिक शास्त्रीय संदर्भ की व्याख्या करता है। डॉ. रत्पनेश वर्मा ने काशी की भौगोलिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला। इस मौके पर डॉ. कामेश्वर उपाध्याय, डॉ. गोपाल चन्द्र, डॉ. शरत चन्द्र, हरिश्चन्द्र साहू, गोविन्द चन्द्र बोहरा, आभा मिश्रा, सरोजिनी महापात्रा, दिव्या सिंह, डॉ. अनुराधा, सुनीति शुक्ला, सरिता त्रिपाठी, डॉ. लक्ष्मी सिंह उपस्थित रहे। संचालन डॉ. विजय रामानुज ने किया।
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वाराणसेय उत्कल समाज की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सबसे पहले दशाश्वमेध घाट से नौका पर सवार होकर 600 से अधिक भक्त अस्सी पहुंचे। जहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं का माल्यार्पण कर पूजन किया। महोत्सव की अध्यक्षता के रूप में प्रतिनिधि के रूप में डॉ. टीएम महापात्रा ने की। गोष्ठी में बोलते हुए डॉ. विजय रामानुज ने बताया कि नित्य पवित्र गंगा की लीलाओं को देखकर सागर भी मुखर हो उठा है। प्रो. श्याम गंगाघर वापट ने कहा कि काशी शिव और गंगा की पौराणिक शास्त्रीय संदर्भ की व्याख्या करता है। डॉ. रत्पनेश वर्मा ने काशी की भौगोलिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला। इस मौके पर डॉ. कामेश्वर उपाध्याय, डॉ. गोपाल चन्द्र, डॉ. शरत चन्द्र, हरिश्चन्द्र साहू, गोविन्द चन्द्र बोहरा, आभा मिश्रा, सरोजिनी महापात्रा, दिव्या सिंह, डॉ. अनुराधा, सुनीति शुक्ला, सरिता त्रिपाठी, डॉ. लक्ष्मी सिंह उपस्थित रहे। संचालन डॉ. विजय रामानुज ने किया।
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