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Mukhtar Ansari: अदालत बोली... फर्जी शस्त्र लाइसेंस लेना अभियुक्त के दुस्साहस का प्रमाण

Thu, 14 Mar 2024 04:26 PM IST
अमन विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 14 Mar 2024 04:26 PM IST
सार

Mukhtar Ansari Case: वर्तमान प्रकरण में अभियुक्त मुख्तार अंसारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 व 120बी और आयुध अधिनियम की धारा 30 तहत दोषसिद्ध किया गया है। जहां तक दोषमुक्ति का प्रश्न है, उक्त आदेश गुण-अवगुण पर पारित किया गया है।

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Court said in Mukhtar Ansari case taking fake arms license proof the audacity accused
मुख्तार अंसारी। - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

एमपी/एमएलए कोर्ट के विशेष न्यायाधीश अवनीश गौतम की अदालत ने मुख्तार अंसारी को सजा सुनाते हुए कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि फर्जी आख्या और शस्त्र रजिस्टर में फर्जी प्रविष्टियां शस्त्र लाइसेंस प्राप्त करने के लिए कराई गई। समस्त घटनाक्रम अभियुक्त की अति उत्साही, नियंत्रण रहित मनोदशा और दुस्साहस का स्वयं प्रमाण है। समस्त प्रकिया में मृतक सहअभियुक्त के अलावा विभाग के अन्य संबंधित कर्मचारियों की संलिप्तता के बगैर किया जाना संभव नहीं था।

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अदालत ने कहा कि पत्रावली में शस्त्र क्रय करने का कोई अभिलेख नहीं है। लाइसेंस पत्रावली में शस्त्र के विक्रय करने हेतु कोई अनुमति अथवा सूचना न होने के बावजूद भी शस्त्र का विक्रय किया गया। ऐसी दशा में यह स्पष्ट है कि जिलाधिकारी के कूटरचित हस्ताक्षर प्राप्त करने के बाद भी अनुज्ञप्ति संबंधी नियमों की अवहेलना कर विधि विरूद्ध तरीके से शस्त्र विक्रय की कार्यवाही अभियुक्त की ओर से सुनिश्चित की गई।
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वर्तमान प्रकरण में अभियुक्त मुख्तार अंसारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 व 120बी और आयुध अधिनियम की धारा 30 तहत दोषसिद्ध किया गया है। जहां तक दोषमुक्ति का प्रश्न है, उक्त आदेश गुण-अवगुण पर पारित किया गया है।
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अभियुक्त पर मृत सहअभियुक्त गौरीशंकर श्रीवास्तव के साथ आपराधिक षड्यंत्र कर अपराध को क्रियान्वित किए जाने का आरोप है, जो स्वयं में अत्यंत गंभीर है। क्योंकि, अभियुक्त ने संबंधित शस्त्र लिपिकों के साथ साजिश कर जिलाधिकारी जैसे वरिष्ठतम अधिकारी के कूटरचित हस्ताक्षर बनवाकर नियमों के विरुद्ध शस्त्र लाइसेंस प्राप्त किया।

राजनीतिक द्वेष में फंसाने की मुख्तार की दलील में दम नहीं- अदालत

मुख्तार अंसारी की ओर से तर्क दिया गया कि वर्तमान प्रकरण में राजनीतिक विद्वेषवश उसे जानबूझकर झूठा फंसाया गया है। इस पर अदालत ने कहा कि पत्रावली के अवलोकन से स्पष्ट है कि प्रकरण वर्ष 1986-87 से संबंधित है। यानी घटना की एफआईआर लगभग 37-38 वर्ष पुरानी है। मुकदमा 1990 में दर्ज हुआ। उस समय अभियुक्त की उम्र लगभग 22-24 वर्ष के आसपास रही होगी। 

विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट भी जुलाई 1993 की है। अभियुक्त की ओर से यह स्वीकार किया गया है कि उस समय उसका कोई राजनीतिक या आपराधिक इतिहास नहीं था। ऐसी दशा में एफआईआर को राजनीतिक विद्वेषवश दर्ज होना नहीं कहा जा सकता है। पत्रावली के अवलोकन से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रकरण में अभियुक्त के विरुद्ध वर्ष 2021 में आरोप विरचित किया गया। उसके पश्चात ही साक्ष्यांकन की समस्त कार्यवाही संपन्न हुई। अतः उपरोक्त परिस्थितियों में अभियुक्त को फर्जी फंसाए जाने का तर्क किसी भी प्रकार से युक्ति युक्त प्रतीत नहीं होता है।

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