Corona Alert: कोविड के सुपर स्प्रेडर बन सकते हैं भीड़भाड़ वाले स्थान, BHU के अध्ययन में हुआ खुलासा
वाराणसी आए कोलकाता विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. राकेश तमांग ने कहा कि बड़ी सामाजिक सभाओं ने कोविड-19 को फैलने में मदद की। संभवतः अधिक भीड़भाड़ वाले स्थानों या कार्यक्रमों से संक्रमण सामान्य से 5 से 10 गुना तेजी से बढ़ा।
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भीड़भाड़ वाले स्थान कोविड के सुपर स्प्रेडर बन सकते हैं। ऐसे मामले उत्तर भारत में पहले भी सामने आ चुके हैं। दुनिया भर के सात संस्थानों के 15 वैज्ञानिकों की टीम को अल्फा वेरिएंट जनित कोविड-19 के मामलों में असामान्य वृद्धि मिली थी, जो अल्फा वेरिएंट के प्रसार से बिल्कुल अलग थी।
अध्ययन करने वाली टीम का नेतृत्व कर रहे बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि 3085 अल्फा वेरिएंट के जीनोमिक सीक्वेंस का विश्लेषण किया। इससे पता चला कि पंजाब में कोरोना का अचानक आया उछाल प्राकृतिक नहीं था। इसका फैलाव तकनीकी रूप से तेज था और नाममात्र के फाउंडर्स क्लस्टर से जुड़ा था।
पंजाब से प्राप्त जीनोमिक सीक्वेंस स्वतंत्र वंशावली के बजाय कुछ ही क्लस्टर्स से जुड़े थे। इस तरह के फाउंडर क्लस्टर आमतौर पर सुपरस्प्रेडर इवेंट्स, इनडोर मीटिंग्स या किसी बड़ी सभा के कारण देखने को मिलते हैं। संभवतः अधिक भीड़भाड़ वाले स्थानों या कार्यक्रमों से संक्रमण सामान्य से 5 से 10 गुना तेजी से बढ़ा।
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भारत में अल्फा वेरिएंट ज्यादा
जाह्नवी पारासर ने कहा कि उत्तर भारत में अल्फा वेरिएंट प्रमुख रूप से उपस्थित था। इस वेरिएंट की कई फाउडिंग शाखाएं देखी गईं। भारत में अल्फा वेरिएंट का प्रसार प्रमुख रूप से दिल्ली, चंडीगढ़ और पंजाब के राज्यों में था, जहां इसकी 44 जेनेटिक शाखाएं मौजूद थीं। तीन शाखाओं को छोड़कर भारत में अल्फा वेरिएंट की सभी 44 शाखाएं दिल्ली, पंजाब और चंडीगढ़ में मौजूद थीं।
सामूहिक सभाएं करती हैं रोगों के फैलने में मदद
प्रो. चौबे ने बताया कि सामूहिक सभाएं मानवजनित रोगों के फैलने में मदद करती हैं। 2009 की महामारी इन्फ्लूएंजा या मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम से संबंधित कोरोना वायरस और 2013 में मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम का प्रकोप इसके उदाहरण हैं। हालांकि, बीमारी के संचरण और प्रसार में इस तरह की सामूहिक सभाओं की सटीक भूमिका का पूरी तरह से आकलन वैज्ञानिक रूप से नहीं हो पाया था।