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BHU ट्रॉमा सेंटर का हाल: मशीनें हैं, फिर भी नहीं हो पा रहा बच्चों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट

Mon, 16 Jan 2023 03:11 PM IST
उत्पल कांत रबीश श्रीवास्तव, अमर उजाला, वाराणसी
रबीश श्रीवास्तव, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Mon, 16 Jan 2023 03:11 PM IST
सार

बीएचयू ट्रॉमा सेंटर परिसर में बोन मैरो ट्रांसप्लांट एंड स्टेम सेल सेंटर बनवाया गया है। यहां स्टाफ की कमी से थैलेसीमिया ग्रसित बच्चों का ट्रांसप्लांट अटका है। दस बच्चे ऐसे हैं, जो लंबे समय से ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे हैं। 

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Condition of BHU Trauma Center There are machines  yet bone marrow transplant of children is not
बीएचयू ट्रॉमा सेंटर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बीएचयू अस्पताल के बोन मैरो ट्रांसप्लांट एवं स्टेम सेल रिसर्च सेंटर में स्टाफ की कमी से थैलेसीमिया ग्रसित बच्चों का ट्रांसप्लांट अटका है। दस बच्चे ऐसे हैं, जो लंबे समय से ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे हैं। इसके लिए आईएमएस बीएचयू में भवन बनकर तैयार है। मशीनें लगी हैं। सारे उपकरण भी हैं, लेकिन स्टाफ की वजह से संचालन नहीं हो पा रहा है। एक बच्चे के ट्रांसप्लांट पर करीब 15-20  लाख रुपये खर्च होते हैं। 
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बीएचयू ट्रॉमा सेंटर परिसर में बोन मैरो ट्रांसप्लांट एंड स्टेम सेल सेंटर बनवाया गया है। इसमें वाराणसी व आसपास के जिलों से आने वाले बच्चों का नियमानुसार ट्रांसप्लांट हो रहा है। इसी परिसर में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर मैनेजमेंट ऑफ थैलेसीमिया एंड हीमोग्लोबिनोपैथी यूनिट भी है। इसके माध्यम से थैलेसीमिया ग्रसित बच्चों की जांच व इलाज की व्यवस्था होती है। पूर्व कुलपति प्रो. राकेश भटनागर ने अपने कार्यकाल में ट्रांसप्लांट के लिए मशीनें मंगाईं थीं, जो स्टाफ की कमी से नहीं चल सकीं। 
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पंजीकृत हैं 284 बच्चे, दस बच्चों को है जरूरत 
प्रभारी प्रो. विनीता गुप्ता का कहना है कि सेंटर में वाराणसी के साथ ही आसपास के जिलों, झारखंड व बिहार आदि के कुल 284 बच्चे पंजीकृत हैं। बच्चों का खून नियमानुसार हर महीने बदला जाता है। दस बच्चे ऐसे हैं, जिनकी बीमारी ट्रांसप्लांट के बाद ठीक हो जाएगी।  फिलहाल पांच बच्चों के ट्रांसप्लांट किए जाने की सभी औपचारिकताएं भी पूरी की जा चुकी हैं। स्टाफ मिल जाए तो  ट्रांसप्लांट शुरू हो जाएगा। अभी तक यह सुविधा यूपी के एसजीपीजीआई लखनऊ में ही मिलती है।
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भाई-बहन का मिलता है खून, ट्रांसप्लांट से दूर हो जाती है परेशानी

प्रो. विनीता गुप्ता का कहना है कि थैलेसीमिया ग्रसित बच्चों का अगर ट्रांसप्लांट कर दिया जाए तो उनकी बीमारी खत्म हो जाती है। इसके पहले ब्लड मैचिंग (परिवार के सदस्यों से ब्लड ग्रुप की मैचिंग) कराई जाती है। आम तौर पर बच्चे को उसके भाई-बहन का ही खून मिल पाता है। समय-समय पर कैंप लगाकर ऐसे बच्चों की जांच भी कराई जाती है। इसे एचएलए यानी ह्यूमन लिकोसाइड एंटीजन कहा जाता है। 

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