तीन पर्व का शुभ संयोग: एक ही तिथि पर सूर्य संक्रांति, भीष्म और तिल द्वादशी व्रत, तीनों पर्वों का विशेष महत्व
माघ महीने की द्वादशी तिथि को तिल द्वादशी व्रत किया जाता है। इसका जिक्र पद्म, स्कंद और नारद पुराण में किया गया है। माघ महीने की द्वादशी तिथि पर ही भीष्म द्वादशी व्रत होता है।
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एक ही तिथि पर तीन पर्व का संयोग कम ही बनता है। लंबे समय बाद 13 फरवरी को ऐसा ही संयोग बन रहा है। उदयकालीन द्वादशी तिथि में भीष्म द्वादशी पर्व और तिल द्वादशी व्रत किया जाएगा। रविवार को सूर्योदय के साथ कुंभ संक्रांति पर्व मनाया जा रहा है। पर्व का पुण्यकाल सूर्योदय से ही शुरू हो गया जो कि दोपहर तकरीबन 12:20 तक रहेगा।
ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र ने बताया कि सनातन परंपरा में इन तीनों ही पर्वों का विशेष महत्व है क्योंकि सूर्य संक्रांति पर्व आत्म कल्याण और भीष्म द्वादशी पितरों की शांति से जुड़ा है। वहीं, तिल तिथि का संबंध भगवान विष्णु की पूजा से है। रविवार को कुंभ संक्रांति आत्म कल्याण के लिए श्रेष्ठ है।
इस दिन सूर्य को अर्घ्य देने से आत्म कल्याण होता है। मन और शरीर से मजबूती भी आती है। सूर्य उपासना का पर्व है होने के कारण उदयकालीन समय ही महत्वपूर्ण रहेगा। इसलिए सूर्योदय से पहले ही नहाकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। ऐसा न कर पाएं तो दिन के पहले प्रहर तक यानी सुबह 10:10 बजे से पहले नदी-तालाब में स्नान कर भगवान सूर्य को अर्घ्य देना उत्तम रहेगा।
भीष्म और तिल द्वादशी
भीष्म द्वादशी पर्व माघ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को किया जाता है। ये व्रत भीष्म पितामह के निमित्त किया जाता है। इस दिन महाभारत के भीष्म पर्व का पाठ किया जाता है। साथ ही भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है। पितरों की शांति के लिए इस दिन नदी-तालाब या घर में भी तर्पण कर सकते हैं। पितरों के निमित्त इस दिन ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान करना श्रेष्ठ रहेगा।
तिल द्वादशी
माघ महीने की द्वादशी तिथि को तिल द्वादशी व्रत किया जाता है। इसका जिक्र पद्म, स्कंद और नारद पुराण में किया गया है। माघ महीने की द्वादशी तिथि पर भगवान विष्णु की तिल से पूजा की जाती है और तिल का ही दान किया जाता है। पुराणों के मुताबिक ऐसा करने से अश्वमेध यज्ञ करने जितना पुण्य मिलता है।