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मेहनत ला रही रंग, साक्षर बनाने के लिए बढ़े कदम
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केंद्र व राज्य सरकारें शिक्षा और साक्षरता दर बढ़ाने की दिशा में कई प्रयास कर रही हैं। इसके तहत बच्चों, युवाओं, वंचित वर्ग, महिलाओं व बुजुर्गों को भी साक्षर बनाने के लिए काम कर रही हैं। इसमें कई सामाजिक संगठन व युवा नि:स्वार्थ भाव से जुटे हैं। इसके परिणाम स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में काफी सुधार देखने को मिला है। आरटीआई के सात वर्षों के आकड़ों पर गौर करें तो वाराणसी में जहां 2015-16 में महज 81 बच्चों ने प्रवेश लिया वहीं 2021-22 के सत्र तक 28000 से ज्यादा बच्चों ने प्रवेश लिया। हालांकि साक्षरता दर की बात करें तो 2001 के मुकाबले 2011 की जनगणना के मुताबिक महिलाओं की साक्षरता दर में गिरावट देखने को मिली है। लेकिन वर्तमान में सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों इस दिशा में काफी सक्रिय हुए हैं।
2001 में वाराणसी में पुरुष और महिला साक्षरता दर में 10.04 प्रतिशत का अंतर था, वहीं 2011 में यह घटकर 4.20 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई। वाराणसी में 2001 के दौरान 83.66 प्रतिशत साक्षरता दर के बावजूद पुरुषों में 0.12 प्रतिशत ही वृद्धि और 2011 में पुरुषों की साक्षरता दर 83.78 प्रतिशत दर्ज की गई। वहीं 2011 में महिलाओं की साक्षरता 66.69 प्रतिशत दर्ज की गई। जबकि 2001 में यह 73.26 थी। साक्षरता वृद्धि के लिए जिले में कई कारण है इनमें सरकार द्वारा मध्याह्न भोजन योजना, सर्वे शिक्षा अभियान, आरंभ महिला समाख्या योजनाओं का प्रभाव सबसे अधिक रहा।
आरटीई : सात वर्षों में 28000 बच्चों को मिला प्रवेश
शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के तहत जहां 2015-16 में सिर्फ 81 छात्रों का प्रवेश हुआ। वहीं यह आंकड़ा 2021 में बढ़कर 28,283 बच्चों तक पहुंच गया। सत्र 2016-17 में 1567, सत्र 2017-18 में 3995, 2018-19 में 5008, 2019-20 में 9377, 2020-21 में 7448, 2021-22 में 10,000 बच्चों को शिक्षा का अधिकार में प्रवेश दिया गया।
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परिषदीय विद्यालयों में बढ़े विद्यार्थी
बीएसए राकेश सिंह ने बताया कि जिले की शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए परिषदीय विद्यालयों का कायाकल्प किया जा रहा है। जिले के विद्यालयों को स्मार्ट सिटी के तहत मॉडल बनाया जा रहा है। कोरोना काल में गांव तक शिक्षा पहुंचाने के लिए मोहल्ला पाठशाला चलाई गई। साल 19-20 में जहां डेढ़ लाख छात्र परिषदीय विद्यालय में थे, वहीं 2020-21 में ये संख्या 1.96 लाख हो गई।
शिक्षा एक्सप्रेस ने किया बच्चों को बनाया साक्षर
ट्राई टू फाइट फाउंडेशन (टीटीएफ) के युवाओं ने निरक्षरों का नाता अक्षरों से जोड़ दिया है। पूर्व नगर आयुक्त गौरांग राठी की पहल पर नगर निगम द्वारा संचालित शिक्षा एक्सप्रेस ने शिक्षा की ऐसी अलख जगाई है कि जिसने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, वो आज न सिर्फ साक्षर हैं, बल्कि खुद शिक्षा के स्तर को सुधारने में लग गए हैं। उनकी दोस्ती अब कॉपी किताब से हो चली है। टीटीएफ के इन युवाओं ने शिक्षा की जो अलख शहर की विभिन्न मलिन बस्तियों में जगाई तो आज उसकी लौ उनके घर आंगन में भी जल रही है। अपनी पॉकेटमनी खर्च कर बच्चों को सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं। आज इन बच्चों के माता-पिता भी शिक्षा एक्सप्रेस में आकर पढ़ाई कर रहे हैं।
अनपढ़ नहीं जनाब ये है गांव की साक्षर दादियां
कहते हैं पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती है। कुछ ऐसा कर दिखाया है भुल्लनपुर की बुजुर्ग महिलाओं ने। जिन्होंने साक्षरता के जरिए आज गांव में कुछ को साक्षर दादियों का तमगा हासिल कर चुकी हैं। इस बुजुर्ग महिलाओं क ा जीवन संवारने का काम किया है भुल्लनपुर निवासी बीना सिंह ने। ये महिलाएं आज बैंकों में अंगूठे नहीं लगाती, बल्कि कलम से अपना नाम लिखती हैं। बीना की पाठशाला में गांव की 50 साल से लेकर 95 साल तक की बुजुर्ग महिलाएं ककहरा पढ़कर जीवन के अंतिम पड़ाव में खुद को साक्षर कर रही हैं।
साक्षरता दिवस का इतिहास
पहली बार यूनेस्को ने 7 नवंबर 1965 में अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का फैसला लिया। इसके लिए एक दिन निर्धारित किया गया। जिसके बाद हर साल आठ सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाने लगा। यूनेस्को के निर्णय के अगले ही साल यानी 1966 में पहली बार साक्षरता दिवस मनाना शुरू हुआ। राष्ट्र और मानव विकास के लिए समाज के हर वर्ग के लोगों के लिए उनके अधिकारों के बारे में जानना महत्वपूर्ण हैं। लोगों को शिक्षा की ओर से प्रेरित करने के लक्ष्य के तहत साक्षरता दिवस मनाया जाता है।
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2001 में वाराणसी में पुरुष और महिला साक्षरता दर में 10.04 प्रतिशत का अंतर था, वहीं 2011 में यह घटकर 4.20 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई। वाराणसी में 2001 के दौरान 83.66 प्रतिशत साक्षरता दर के बावजूद पुरुषों में 0.12 प्रतिशत ही वृद्धि और 2011 में पुरुषों की साक्षरता दर 83.78 प्रतिशत दर्ज की गई। वहीं 2011 में महिलाओं की साक्षरता 66.69 प्रतिशत दर्ज की गई। जबकि 2001 में यह 73.26 थी। साक्षरता वृद्धि के लिए जिले में कई कारण है इनमें सरकार द्वारा मध्याह्न भोजन योजना, सर्वे शिक्षा अभियान, आरंभ महिला समाख्या योजनाओं का प्रभाव सबसे अधिक रहा।
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आरटीई : सात वर्षों में 28000 बच्चों को मिला प्रवेश
शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के तहत जहां 2015-16 में सिर्फ 81 छात्रों का प्रवेश हुआ। वहीं यह आंकड़ा 2021 में बढ़कर 28,283 बच्चों तक पहुंच गया। सत्र 2016-17 में 1567, सत्र 2017-18 में 3995, 2018-19 में 5008, 2019-20 में 9377, 2020-21 में 7448, 2021-22 में 10,000 बच्चों को शिक्षा का अधिकार में प्रवेश दिया गया।
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परिषदीय विद्यालयों में बढ़े विद्यार्थी
बीएसए राकेश सिंह ने बताया कि जिले की शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए परिषदीय विद्यालयों का कायाकल्प किया जा रहा है। जिले के विद्यालयों को स्मार्ट सिटी के तहत मॉडल बनाया जा रहा है। कोरोना काल में गांव तक शिक्षा पहुंचाने के लिए मोहल्ला पाठशाला चलाई गई। साल 19-20 में जहां डेढ़ लाख छात्र परिषदीय विद्यालय में थे, वहीं 2020-21 में ये संख्या 1.96 लाख हो गई।
शिक्षा एक्सप्रेस ने किया बच्चों को बनाया साक्षर
ट्राई टू फाइट फाउंडेशन (टीटीएफ) के युवाओं ने निरक्षरों का नाता अक्षरों से जोड़ दिया है। पूर्व नगर आयुक्त गौरांग राठी की पहल पर नगर निगम द्वारा संचालित शिक्षा एक्सप्रेस ने शिक्षा की ऐसी अलख जगाई है कि जिसने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, वो आज न सिर्फ साक्षर हैं, बल्कि खुद शिक्षा के स्तर को सुधारने में लग गए हैं। उनकी दोस्ती अब कॉपी किताब से हो चली है। टीटीएफ के इन युवाओं ने शिक्षा की जो अलख शहर की विभिन्न मलिन बस्तियों में जगाई तो आज उसकी लौ उनके घर आंगन में भी जल रही है। अपनी पॉकेटमनी खर्च कर बच्चों को सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं। आज इन बच्चों के माता-पिता भी शिक्षा एक्सप्रेस में आकर पढ़ाई कर रहे हैं।
अनपढ़ नहीं जनाब ये है गांव की साक्षर दादियां
कहते हैं पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती है। कुछ ऐसा कर दिखाया है भुल्लनपुर की बुजुर्ग महिलाओं ने। जिन्होंने साक्षरता के जरिए आज गांव में कुछ को साक्षर दादियों का तमगा हासिल कर चुकी हैं। इस बुजुर्ग महिलाओं क ा जीवन संवारने का काम किया है भुल्लनपुर निवासी बीना सिंह ने। ये महिलाएं आज बैंकों में अंगूठे नहीं लगाती, बल्कि कलम से अपना नाम लिखती हैं। बीना की पाठशाला में गांव की 50 साल से लेकर 95 साल तक की बुजुर्ग महिलाएं ककहरा पढ़कर जीवन के अंतिम पड़ाव में खुद को साक्षर कर रही हैं।
साक्षरता दिवस का इतिहास
पहली बार यूनेस्को ने 7 नवंबर 1965 में अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का फैसला लिया। इसके लिए एक दिन निर्धारित किया गया। जिसके बाद हर साल आठ सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाने लगा। यूनेस्को के निर्णय के अगले ही साल यानी 1966 में पहली बार साक्षरता दिवस मनाना शुरू हुआ। राष्ट्र और मानव विकास के लिए समाज के हर वर्ग के लोगों के लिए उनके अधिकारों के बारे में जानना महत्वपूर्ण हैं। लोगों को शिक्षा की ओर से प्रेरित करने के लक्ष्य के तहत साक्षरता दिवस मनाया जाता है।