लोक आस्था का महापर्व छठः सूर्य उपासना के लिए काशी के घाटों पर वेदी तैयार, बाजार में खरीदारों की उमड़ी भीड़
सूर्योपासना के डाला षष्ठी व्रत छठ की नहाय खाय के साथ ही आज से शुरूआत हो गई है। वाराणसी में गंगा-वरुणा तटों से कुंडों-सरोवरों तक बाजे-गाजे के बीच लोकोत्सव की अनूठी छटा निखरेगी।
विस्तार
सूर्य उपासना का महापर्व छठ आज नहाय खाय के साथ आरंभ हो गया। काशी में व्रतियों ने गंगा घाटो और कुंडों-सरोवरों पर वेदी बनाकर जगह भी पक्की कर ली गई है। कोरोना के बाद आस्था की नगरी काशी एक बार फिर उत्साह, उमंग और उल्लास से इस पर्व को मनाने की तैयारी में है।
महापर्व छठ की संध्या पर काशी के सात किलोमीटर लंबे घाटों की श्रृंखला पर बुधवार शाम और गुरुवार की सुबह विहंगम नजारा देखने को मिलेगा। ढोल-नगाड़ों की थाप, आतिशबाजी और जगह-जगह मंगलगान होगा। वेदियों पर सर्व मंगल की कामना से जले अखंड दीपों की लौ जन-जन के तन-मन को प्रकाशमान करेगी।
सूर्योपासना के डाला षष्ठी व्रत पर अस्ताचलगामी सूर्य और उगते सूर्य को अर्घ्यदान के लिए काशी में भारी भीड़ उमड़ती है। छठ को लेकर पूजन सामग्री की शहर में तमाम दुकानें पर खरीदारों की भीड़ है। रविवार को जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, वैसे वैसे बाजार में खरीदारों की भीड़ बढ़ती गई। महिलाएं देर शाम तक घरों में साफ-सफाई करती रहीं, तो घाटों पर वेदी बनाकर जगह भी पक्की की गई। सोमवार सुबह से गंगा घाटों पर व्रतियों के आने का क्रम जारी है।
पढ़ेंः 15 दिसंबर से पहले तैयार होगा काशी विश्वनाथ धाम, प्रधानमंत्री मोदी करेंगे लोकार्पण
इनकी होती रही खरीदारी
रविवार को छठ पूजा के लिए बाजारों में रौनक रही। महिलाओं ने कोसी, पीतल का सूप, बांस का सूप, दउरा, डगरा, गन्ना, नारियल सहित पूजा के हर छोटे-छोटे सामान की खरीदारी की। कपड़े की दुकानों पर साड़ियों की खरीदारी भी खूब हुई। शृंगार के दुकानों पर भी महिलाओं की भीड़ रही।
खरना मंगलवार को
दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रती महिलाएं दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करती हैं। इसे खरना कहा जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस से बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है।
सायंकाल अर्घ्य बुधवार को
तीन दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। इसे ठेकुवा या टिकरी भी कहते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती महिलाएं अस्ताचलगामी सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य देती हैं।
पढ़ेंः नागनथैया लीला आज: काशी में कालिया नाग के अहंकार का मर्दन करेंगे कान्हा, देंगे पर्यावरण स्वच्छता का संदेश
प्रात: अर्घ्य बृहस्पतिवार को