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बनारस में एक ही मंच से कभी फागुन की बहार तो कभी बही चैती की बयार

Wed, 28 Mar 2018 12:58 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Wed, 28 Mar 2018 12:58 AM IST
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chaiti and faagun song performance by malini awasthi in varanasi
पीएनयू क्लब में ‘सुगना बोलतीं हमरी अटरिया’ का आयोजन - फोटो : अमर उजाला
चैत की शाम जब फागुन के रंग बिखरे तो हर किसी के जेहन में होली की उमंग जीवंत हो उठी। पीएनयू क्लब के सजे मंच पर काशी की संगीत परंपरा की कड़ी में कभी फागुन की बहार तो कभी चैती की बयार श्रोताओं ने महसूस की। मौका था ‘सुगना बोलतीं हमरी अटरिया’ के आयोजन का। यह शाम पद्मभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र और पद्मश्री मालिनी अवस्थी के सुरों से सजी। कार्यक्रम के दौरान श्रोता आनंद में डूबते, उतराते नजर आए।
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 सबसे पहले पद्मभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र ने गणेश वंदना से गायन की शुरुआत की। उनकी दूसरी प्रस्तुति काशी नगरी की महिमा को बखानती ‘काशी नगरी की महिमा अपार है शिव क दरबार है’ रही। भावपूर्ण पेशकश ‘खेले मसाने में होली दिगंबर खेले मसाने में होली’ पर श्रोता झूम उठे। इसके बाद पद्मश्री मालिनी अवस्थी के गायन ने समां बांध दिया।
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उन्होंने अपने गायन की शुरुआत ठुमरी से की। शुरुआत राग माज खमाज में ‘जाग पड़ी मैं तो पिया के जगाए’ से किया। इसके बाद दादरा ‘पूरब देश से आई गोरिया’ सुनाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। चैती की शुरुआत ‘सुगना बोलतीं हमरी अटरिया’ से की जिसको श्रोताओं ने खूब सराहा।
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उनकी अगली प्रस्तुति चैती रही जिसके बोल ‘सोवत निंदिया...भोरे-भोरे’ सुनाया। उन्होंने एक के बाद एक ठुमरी और चैती पेश की। इस दौरान लोगों ने फरमाइशें भी कीं। सहयोगी कलाकारों में हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्र, सारंगी पर उस्ताद मुराद अली खां और तबले पर पं. रामकुमार मिश्र ने संगत की। 

ताकि जिंदा रहे विधा

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पद्मश्री मालिनी अवस्थी - फोटो : अमर उजाला
पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान बताया कि चैती में फागुन के गीत तो नही गाने चाहिए पर विधा से लोग परिचित हों, इसको समझे यह भी हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि धर्म पंडितों की मानें तो सावन में फागुन या चैत में पीछे के महीनों के गीत नही गाए जाते।

हमारे संस्कृति में पीछे मुड़ के देखना भी गलत माना जाता है। उत्तर प्रदेश में ही चैती ठुमरी के बारे में लोग जानते हैं। इससे बाहर जाते ही लोगों को यह समझ नही आता है।

दूसरे राज्यों में प्रस्तुतियों के दौरान लोग फरमाइश करते हैं कभी ठुमरी और कभी चैती, पंडितों के हिसाब से यह सही नही है पर उनको इस विधा की जानकारी हो सके और यह संस्कृति जिंदा रहे इसके लिए यह प्रस्तुतियां दी जाती हैं।


पं. धर्मनाथ मिश्र ने जताई प्रसन्नता
संस्कृति विभाग के प्रतिष्ठित बेगम अख्तर सम्मान पाने वाली लिस्ट में शामिल उपशास्त्रीय गायक और हारमोनियम वादक धर्मनाथ मिश्र ने बताया कि उन्हें भी सम्मान मिलने की जानकारी हुई है और वह इससे खासा खुश और गर्वान्वित महसूस कर रहे हैं।

पंडित मिश्र पीएनयू क्लब में हुए कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने इसके लिए प्रदेश सरकार को धन्यवाद दिया। बता दें कि बीते सोमवार को इस सम्मान की घोषणा की गई। 29 मार्च को यह सम्मान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देंगे।

वाराणसी में जन्मे पं. धर्मनाथ मिश्र ने भारतखंडे संगीत संस्थान में अपनी नौकरी के कारण लखनऊ को कर्मभूमि बनाया।  उन्होंने कहा कि यह सम्मान इस कारण विशिष्ट है क्योंकि इसके साथ एक विख्यात गायिका का नाम जुड़ा है।

उन्हाेंने बताया कि वह खुशकिस्मत है किउनके साथ कई कार्यक्रमों में संगत का अवसर मिला। उन्होंने मेरी संगत को सराहा और आज जब उनके नाम का पुरस्कार मिल रहा है तो यह भी उनकी सराहना की तरह ही है।
 
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