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काशी आए थे संस्कृत अध्ययन के लिए, बने क्रांतिकारी

Sun, 24 Jul 2022 01:39 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 24 Jul 2022 01:39 AM IST
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Came to Kashi to study Sanskrit, became a revolutionary
उन्नाव के बदरका में सीताराम तिवारी के घर 23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर आजाद का काशी से गहरा नाता था। क्रांतिकारियों के गढ़ बनारस में चंद्रशेखर किशोरावस्था में ही संस्कृत की पढ़ाई करने आ गए थे। पढ़ाई के दौरान ही वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए थे। बनारस में ही मन्मथनाथ गुप्ता से मुलाकात के बाद आजाद सबसे पहले क्रांतिकारी दल के सदस्य बने थे जिसे हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ के नाम से पुकारा जाता था।
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क्रांतिकारी नेता चंद्रशेखर आजाद ने 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में खुद को गोली मार ली थी। उनकी शहादत के बाद किसी भी व्यक्ति में हिम्मत नहीं हुई कि वह अंग्रेजों से अंतिम संस्कार के लिए आजाद का मृत शरीर मांग सके। आजाद के फूफा पं. शिवविनायक मिश्र को जब यह बात पता चली तो वह सीधे इलाहाबाद पहुंचे और आजाद का अंतिम संस्कार किया। आजाद की पवित्र अस्थियों को उन्होंने अपनी मृत्यु तक खोजवां स्थित अपने घर पर ही रखा था। उनके मरने के बाद आजाद के फुफेरे भाईयों राजीव लोचन मिश्र, फूलचंद मिश्र और श्याम सुंदर मिश्र ने 10 जुलाई 1976 को अस्थिकलश राज्य सरकार के प्रतिनिधि सरदार कुलतार सिंह को सौंप दिया। स्व. राजीव लोेचन मिश्र के पुत्र डॉ. कृष्ण मोहन मिश्र बताते हैं कि लखनऊ के म्यूजियम में आजाद का अस्थिकलश आज भी रखा हुआ है। अमरशहीद चंद्रशेखर आजाद पर शोध कर रहे बनारस बार के पूर्व महामंत्री अधिवक्ता नित्यानंद राय ने मांग की है कि आजाद के अस्थिकलश को बनारस वापस मंगवा कर बनारस में ही उनके याद में स्मारक बनाते हुए उस अस्थिकलश को वहां दर्शनार्थ रखा जाए।
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आज भी सहेज रखी है चंद्रशेखर आजाद की तस्वीर
चंद्रशेखर आजाद के करीबी रिश्तेदार और प्रपौत्र डॉ. कृष्ण मोहन मिश्र ने उनके बाल्यकाल की एकमात्र तस्वीर को आज भी अपने पास सहेज कर रखा हुआ है। आजाद के पिता ने उनको बनारस में पियरी स्थित उनके फूफा शिव विनायक मिश्र के यहां रहकर पढ़ने के लिए भेजा था। अध्ययन के शुरुआती दिनों में वे अपने फूफा के यहां ही रहते थे।
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