मतदान के अगले चरणों में बसपा से होगा हमारा मुकाबलाः ओम माथुर
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अब तक चार चरण के लिए मतदान हो चुका है। पार्टी की पोजीशन को लेकर क्या फीडबैक है?
हम प्रचंड बहुमत से सरकार बना रहे हैं। वजह यह है कि जनता जब मन बना लेती है तो कुछ भी हो सकता है। पूरे प्रदेश के दौरों और सभाओं का अनुभव है कि गुंडाराज और भ्रष्टाचार से निजात पाने और विकास के लिए बदलाव के लिए प्रदेश के मतदाताओं ने मन बना लिया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने भी पहले से ही ऐसा ही मन बना लिया था। नतीजा सपा और कांग्रेस ‘परिवार’ के अलावा दूसरा कोई भी प्रत्याशी नहीं जीत सका। ऐसा ही इस चुनाव में भी होने वाला है।
किस पार्टी से कहां-कहां मुकाबला हुआ और आगे क्या देखते हैं?
अरसे बाद हमारी पार्टी सब जगह मुकाबले में हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी की पोजीशन पहले से बेहतर हुई है। पहले तीन चरणों में सपा से हमारा कड़ा मुकाबला हुआ। चौथे चरण में मुकाबला मिला-जुला रहा। बावजूद इसके हम बहुत आगे हैं। पांचवे से सातवें व अंतिम चरण के मतदान में हम बसपा से दो-चार होने जा रहे हैं। आखिरी दौर के इन चुनावों में सपा कहीं नहीं है।
आप पार्टी के अच्छे रणनीतिकार माने जाते हैं। इस चुनाव में क्या खास प्रयोग किए गए हैं?
इस बार के चुनाव में पार्टी सामाजिक मुद्दों, राजनीतिक विचारधारा और तकनीक से तालमेल बनाते हुए चुनाव लड़ रही है। इन तीन मजबूत आधारों पर हमने पहले ही होमवर्क कर लिया था। बूथ स्तर से लेकर यूथ की टीम बना ली थी। इसी के चलते पार्टी सभी छह प्रांत (सांगठनिक ढांचे के लिहाज से) में लीड कर रही है।
पूर्वांचल की कुछ सीटों पर मुख्तार और अफजाल फैक्टर को कैसे देखते हैं? क्या इससे पार्टी परेशान है?
पूर्वांचल के कुछ जिलों में मुख्तार अंसारी और अफजाल अंसारी फैक्टर अब काम नहीं करेगा। दरअसल, जब जनता जागती है तो किसी भी किस्म का फियर फैक्टर काम नहीं करता है। बाहुबल और माफिया के बल पर राजनीति को लोग मजबूरी में ही बर्दाश्त करते हैं। भाजपा ने गुंडामुक्त शासन का वादा किया है। लोग उस पर भरोसा कर रहे हैं।
टिकट बंटवारे को लेकर असंतोष और बगावत पार्टी की उम्मीदों पर असर डालेगी?
कोई असर नहीं पड़ने वाला है। भाजपा कार्यकर्ता आधारित अकेली पार्टी है। सबको मालूम है कि आज जो बड़े पदों पर हैं, कभी बूथ स्तर के कार्यकर्ता रह चुके हैं। इसके उलट सपा और कांग्रेस एक परिवार की पार्टी है। यहां दूसरे कार्यकर्ताओं को मौका नहीं मिलता है। सपा में तो शिवपाल का कद बढ़ने पर फैमिली ड्रामा कर उन्हें साइड लाइन कर दिया गया। बसपा एक महिला की पार्टी है। वहां भी उनके अलावा किसी कार्यकर्ता का कद नहीं बढ़ा।