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लीक से हटकर भुवनेश्वर प्रसाद ने रचा साहित्य का संसार

Sun, 20 Jun 2021 01:48 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 20 Jun 2021 01:48 AM IST
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Bhuvneshwar Prasad created the world of literature out of the box
आदर्श और यथार्थवाद के दौर में भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव हिंदी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत का ऐसा नाम है, जिसने छोटे से जीवन काल में लीक से हटकर अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। उन्होंने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतिरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है। आज उनकी जयंती मनाई जाएगी।
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नागरी प्रचारिणी सभा के बृजेश पांडेय ने बताया कि एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने उन्हें भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक खास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। प्रेमचंद ने उनसे हंस से स्थाई रूप से जुड़ने का आग्रह किया था। परंतु अनजाने कारणों से यह संवाद पूरा न हो सका। हालांकि उनकी रचनाएं हंस में लगातार प्रकाशित होती रहीं, लेकिन अगर वह हंस के साथ जुड़ जाते तो उनका रचना संसार कहीं अधिक विस्तृत रूप में हमारे सामने होता।
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नवगीतगार सुरेंद्र वाजपेयी ने बताया कि उनकी रचनाओं में कलातीतता का बोध है, परंतु आश्चर्यजनक रूप से यह भूतकाल से न जुड़कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नजर आती हैं। भुवनेश्वर का जन्म शाहजहांपुर के केरुगंज (खोया मंडी) में, 20 जून, 1910 में हुआ था। परंतु बचपन में ही मां की मौत से परिस्थितियां उनके विपरीत हो गई। व्यक्तिगत रूप से भुवनेश्वर का जीवन अभावों एवं कठिनताओं का पुलिंदा था। इलाहाबाद, बनारस और लखनऊ में भटकते भुवनेश्वर के लिए मित्र मंडली के घर आसरा, और कठिनाइयों का चोली दामन का साथ रहा। इन परेशानियों में भी उनकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रही।
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प्रेमचंद ने दी ‘कटुता’ कम करने की राय
एक बार स्वयं प्रेमचंद ने उनसे अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने की राय दी थी, जिस पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिए। कारवां की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाजे हैं। उनका यह मानना उनकी रचनाओं में स्पष्टतया दृष्टिगोचर भी होता भी है।

रचनाओं को लोगों तक पहुंचाने की जरूरत
इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी, वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनके अंतिम समय की रचनाओं को सहेजना वाला उनके साथ कोई नहीं था, फलस्वरूप उस दौरान रफ कागजों के पीछे लिखा गया हिंदी और अंग्रेजी का पूर्णतया मौलिक साहित्य अंधेरों में गुम हो गया। भुवनेश्वर की उपलब्ध सभी रचनाओं को आज पुन: लोगों तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
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