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UP: 5000 साल पहले यूपी में सोने के सिक्कों से होती थी खरीदारी, शोध के आधार पर प्रो. बीआर मणि ने दी जानकारी

Fri, 07 Nov 2025 08:57 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Fri, 07 Nov 2025 08:57 PM IST
सार

बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग में विख्यात पुराविद प्रो. बीआर मणि ने कहा कि अब तक भारत में सोने के सिक्कों का इतिहास दो हजार साल पहले कुषाण काल (पहली–तीसरी शताब्दी ई.) का बताया जाता रहा है।

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BHU Prof. BR Mani provided specific information based on research
बीएचयू में प्रो. बीआर मणि का स्वागत करते प्रो. एमपी अहिरवार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत में पहली बार 5000 साल प्राचीन सोने के सिक्के यूपी में मिले हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के मांडी में मिले सोने और चांदी के सिक्कों का इतिहास पूर्व हड़प्पा काल का बताया जा रहा है। तब इन्हें निष्क कहा जाता था और इनका वस्तुओं की खरीद-बिक्री में इस्तेमाल होता था। इन गोलाकार मुद्राओं के बीच एक छेद भी है जिससे पता चलता है कि इनका इस्तेमाल आभूषणों में खूब किया गया। ये जानकारी बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग में विख्यात पुराविद प्रो. बीआर मणि ने एक शोध के आधार पर दी।

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उन्होंने कहा कि अब तक भारत में सोने के सिक्कों का इतिहास दो हजार साल पहले कुषाण काल (पहली–तीसरी शताब्दी ई.) का बताया जाता रहा है। जबकि पूर्व हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल और राखीगढ़ी से सोने के सिक्कों के कई प्रमाण मिल चुके हैं।
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बृहस्पतिवार को विभाग के शताब्दी वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में प्रो. मणि ने कहा कि साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर इसका खुलासा हुआ है और रिसर्च पेपर भी प्रकाशित किया जा चुका है। प्रो. मणि भारतीय विरासत संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति भी रहे। उनके शोध के अनुसार निष्क का उल्लेख ऋग्वेद और उत्तर वैदिक ग्रंथों में मिलता है। यह भारत की पहली स्वर्ण मुद्रा थी। 

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वैदिक काल में कहते थे सहस्र निष्कपति

वैदिक काल में निष्क को केवल आभूषण या हार के रूप में माना गया था, लेकिन जब हम साहित्यिक और पुरातात्विक साक्ष्यों को मिलाकर देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि निष्क आर्थिक लेनदेन की एक स्वर्ण इकाई थी। सहस्र निष्कपति जैसे वैदिक पद इसके मुद्रा स्वरूप की पुष्टि करते हैं। भारत कला भवन के पूर्व निदेशक डॉ. डीपी शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। स्वागत विभागाध्यक्ष प्रो. एमपी अहिरवार और डॉ. विनोद जायसवाल ने धन्यवाद ज्ञापित किया। संचालन डॉ. निधि पांडेय ने किया। इस दौरान डॉ. सचिन तिवारी, डॉ. विराग आदि मौजूद रहे।
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