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डीएनए फिंगर प्रिंट के जनक व बीएचयू के पूर्व कुलपति लालजी सिंह का निधन
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Mon, 11 Dec 2017 02:01 PM IST
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डॉ. लालजी सिंह
- फोटो : file photo
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बीएचयू के पूर्व कुलपति एवं वैज्ञानिक पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह का दिल का दौरा पड़ने के कारण रविवार की देर रात निधन हो गया। बीएचयू के आईसीयू में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से बीएचयू परिसर और उनके गांव में शोक की लहर दौड़ गई।
उनका अंतिम संस्कार सोमवार को वाराणसी में किया जाएगा। बीएचयू के कुलपति रहे डॉ. लालजी सिंह को फादर आफ डीएनए फिं गरप्रिंट के नाम से भी जाना जाता था।
रविवार की शाम को अपने पैतृक निवास जौनपुर से हैदराबाद जाने के दौरान बाबतपुर एयरपोर्ट पर उन्हें हार्ट अटैक आ गया। एयरपोर्ट पर प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने उन्हें बीएचयू के लिए रेफर कर दिया। बीएचयू आईसीयू में इलाज के दौरान डॉ. लालजी सिंह का निधन हो गया।
इस दौरान बीएचयू के वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे। बीएचयू के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राजेश सिंह ने बताया कि डॉ. लालजी सिंह का शव उनके गांव कलवारी ले जाया जाएगा। डा. लालजी सिंह अगस्त 2011 से अगस्त 2014 तक बीएचयू के कुलपति रहे।
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लालजी सिंह ने जहां से शिक्षा-दीक्षा ली वहीं उन्होंने अंतिम सांस भी ली। कुलपति के कार्यकाल के दौरान वह मात्र एक रुपये वेतन लिया करते थे। इंटरमीडिएट तक शिक्षा जौनपुर जिले में लेने के बाद उच्च शिक्षा के लिए 1962 में श्री सिंह बीएचयू चले आए थे।
यहां से उन्होंने बीएससी, एमएससी और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। 2004 में उन्हें भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया गया।
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उनका अंतिम संस्कार सोमवार को वाराणसी में किया जाएगा। बीएचयू के कुलपति रहे डॉ. लालजी सिंह को फादर आफ डीएनए फिं गरप्रिंट के नाम से भी जाना जाता था।
रविवार की शाम को अपने पैतृक निवास जौनपुर से हैदराबाद जाने के दौरान बाबतपुर एयरपोर्ट पर उन्हें हार्ट अटैक आ गया। एयरपोर्ट पर प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने उन्हें बीएचयू के लिए रेफर कर दिया। बीएचयू आईसीयू में इलाज के दौरान डॉ. लालजी सिंह का निधन हो गया।
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इस दौरान बीएचयू के वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे। बीएचयू के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राजेश सिंह ने बताया कि डॉ. लालजी सिंह का शव उनके गांव कलवारी ले जाया जाएगा। डा. लालजी सिंह अगस्त 2011 से अगस्त 2014 तक बीएचयू के कुलपति रहे।
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लालजी सिंह ने जहां से शिक्षा-दीक्षा ली वहीं उन्होंने अंतिम सांस भी ली। कुलपति के कार्यकाल के दौरान वह मात्र एक रुपये वेतन लिया करते थे। इंटरमीडिएट तक शिक्षा जौनपुर जिले में लेने के बाद उच्च शिक्षा के लिए 1962 में श्री सिंह बीएचयू चले आए थे।
यहां से उन्होंने बीएससी, एमएससी और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। 2004 में उन्हें भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया गया।
45 वर्षों में 230 रिसर्च पेपर हुए प्रकाशित
BHU
उत्तर प्रदेश में जौनपुर जिले के सदर तहसील एवं सिकरारा थाना क्षेत्र के कलवारी गांव के निवासी स्व. ठाकुर सूर्य नारायण सिंह के पुत्र थे। पांच जुलाई 1947 को डॉ. लालजी सिंह का जन्म हुआ था।
वर्ष 1971 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने के बाद वे कोलकाता गये जहां पर साइंस में 1974 तक एक फे लोशिप के तहत रिसर्च किया। इसके बाद वे छह माह की फे लोशिप पर यू.के. गए और तीन माह की बढोत्तरी लेकर नौ माह बाद वापस भारत आए।
जून 1987 में सीसीएमबी हैदराबाद में वैज्ञानिक पद पर कार्य करने लगे और 1998 से 2009 तक वहां के निदेशक रहे। डॉ लालजी सिंह हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र के भूतपूर्व निदेशक थे। वह भारत के नामी जीवविज्ञानी थे।
लिंग निर्धारण का आणविक आधार, डीएनए फिं गरप्रिंटिंग, वन्यजीव संरक्षण, रेशमकीट जीनोम विश्लेषण, मानव जीनोम एवं प्राचीन डीएनए अध्ययन आदि उनकी रुचि के प्रमुख विषय थे। 45 वर्षों में 230 रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए थे।
वर्ष 1971 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने के बाद वे कोलकाता गये जहां पर साइंस में 1974 तक एक फे लोशिप के तहत रिसर्च किया। इसके बाद वे छह माह की फे लोशिप पर यू.के. गए और तीन माह की बढोत्तरी लेकर नौ माह बाद वापस भारत आए।
जून 1987 में सीसीएमबी हैदराबाद में वैज्ञानिक पद पर कार्य करने लगे और 1998 से 2009 तक वहां के निदेशक रहे। डॉ लालजी सिंह हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र के भूतपूर्व निदेशक थे। वह भारत के नामी जीवविज्ञानी थे।
लिंग निर्धारण का आणविक आधार, डीएनए फिं गरप्रिंटिंग, वन्यजीव संरक्षण, रेशमकीट जीनोम विश्लेषण, मानव जीनोम एवं प्राचीन डीएनए अध्ययन आदि उनकी रुचि के प्रमुख विषय थे। 45 वर्षों में 230 रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए थे।