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Holi: गालियां सुनने के बाद झक्कड़ साह करते थे राहगीर का सत्कार, भारतेंदु हरिश्चंद्र ऐसे मनाते थे होली

Sun, 24 Mar 2024 06:15 PM IST
अमन विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sun, 24 Mar 2024 06:15 PM IST
सार

Holi 2024: होली में बनारस की रइसी का अंदाज ही अलग हुआ करता था। परदादा तो होली पर पक्कामहाल की नालियों में ड्रम के ड्रम इत्र डलवा दिया करते थे। उनका कहना था कि त्योहार पर हर किसी को खुशबू का अहसास होना चाहिए। वह रंगों की बजाय इत्र से ही होली खेलते थे। होली के बाद पहले मंगलवार को उन्होंने बुढ़वा मंगल की परंपरा शुरू की थी। वह बनारस के रइसों के आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी।

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Bhartendu Harishchandra used to celebrate Holi in varanasi ghat
Holi 2024 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचना... गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में, बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में... बनारस की होली को बयां करने के लिए काफी है। रंग-भंग, गारी और लोक संगीत की जुगलबंदी वाले शहर की होली का आकर्षण हर किसी को बांध ही लेता है। यहां नाथ से, भस्म से, भभूत से, रेत से और प्रेत से होली खेली जाती है। काशी का अस्सी में साहित्यकार डॉ. काशीनाथ सिंह कहते हैं गालियां क्या हैं? जीवन की अकुंठ उच्छल ध्वनियों का समारोह हैं।

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भारतेंदु हरिश्चंद्र की पांचवीं पीढ़ी के दीपेश चैधरी ने बताया कि होली में बनारस की रइसी का अंदाज ही अलग हुआ करता था। परदादा तो होली पर पक्कामहाल की नालियों में ड्रम के ड्रम इत्र डलवा दिया करते थे। उनका कहना था कि त्योहार पर हर किसी को खुशबू का अहसास होना चाहिए। वह रंगों की बजाय इत्र से ही होली खेलते थे। होली के बाद पहले मंगलवार को उन्होंने बुढ़वा मंगल की परंपरा शुरू की थी। वह बनारस के रइसों के आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी। गंगा की लहरों पर बजड़ों पर सजने वाली महफिल की रौनक तो देखते ही बनती थी।

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...गंगा का पानी लाल हो जाता था

नवगीतकार सुरेंद्र वाजपेयी का कहना है कि पुरनियों से सुनते आ रहे हैं कि पक्का महाल में शेरवाली कोठी के झक्कड़ साह पान खाकर अपनी खिड़की पर बैठ जाया करते। उस रास्ते से गुजरने वालों के ऊपर वह पान थूक देते और जब राहगीर गुस्सा होकर गालियां देता तो प्यार से उसकी गालियां सुनते। उसके बाद अपने नौकरों से उस व्यक्ति को बुलाकर नए कपड़े, रुपये, खाने-पीने का सामान देकर सत्कार करने के बाद रवाना करते। कई लोग तो केवल पान की पीक के लिए उस रास्ते से गुजरते थे। बनारस में होली के दौरान इतना अबीर, गुलाल उड़ता था कि गंगा का पानी लाल हो जाता था।

नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ला ने बताया कि काशी में होली के दौरान गालियों की भी परंपरा है। अस्सी घाट पर होने वाले हास्य कवि सम्मेलन में लोग गालियां खाकर स्वयं को धन्य समझते थे, जिसमें गाली सुनने का मतलब होता था उस व्यक्ति ने किसी विद्या, किसी व्यवसाय में विशेष स्थान हासिल कर लिया हो। बनारस के हास्य कवि ऐरे गैरों को गालियां नहीं देते थे।

महाराज बनारस से शुरू होने वाली गालियों की लड़ी देवाधिदेव महादेव पर पूरी होती थी। हर-हर महादेव से शुरू उद्घोष तीन शब्दों की गाली पर पूर्ण होता था। उसने मानों किसी मंत्र की सिद्धि हासिल कर ली हो। यह बनारस की होली का वह पहलू है जो और कहीं नहीं है। इसी मस्ती ने पप्पू की अड़ी को, पोई वाली अड़ी को जन्म दिया।

संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. राजेश्वर आचार्य का कहना है कि शिव की नगरी काशी में होली का रंग सबसे जुदा है। बाबा विश्वनाथ के दरबार से शुरू होकर होली का सिलसिला बुढ़वा मंगल तक चलता है। होली पर निकलने वाली बरात एक अनूठी परंपरा है। भांग और ठंडाई के बिना बनारसी होली की कल्पना भी नहीं कर सकते।

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