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आस्था: शिव के बालरूप में पूजे जाते हैं बटुक भैरव, 17वीं शताब्दी से पहले का है मंदिर; जानिए पंचमकार पूजन विधि
Fri, 14 Jun 2024 03:56 PM IST
अमन विश्वकर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
Published by: अमन विश्वकर्मा
Updated Fri, 14 Jun 2024 03:56 PM IST
सार
Varanasi News: मंदिरों के शहर काशी में बटुक भैरव का अलग स्थान है। प्रतिदिन यहां पूजन-अर्चन का दौर चलता है। आसपास के जिलों से भी भक्त यहां दर्शन करते आते हैं। यहां रोजाना महाचक्र पूजन भी होता है।
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बाबा बटुक भैरव।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
नवग्रहों के राजा बाबा बटुक भैरव की जयंती गंगा दशहरा (16 जून) को मानस वरीयान योग और चित्रा नक्षत्र में मनाई जाएगी। बाबा का सबसे प्राचीन मंदिर काशी में विराजमान है, जहां दर्शन-पूजन से भयंकर शारीरिक, मानसिक कष्ट और ग्रहदोष दूर हो जाते हैं।
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धार्मिक मान्यता के अनुसार बाबा बटुक भैरव को भगवान शिव और काली का पुत्र माना गया है। उन्हें बाल विशेश्वर भी कहा जाता है। उनमें सभी ग्रहों की शांति की क्षमता है, चाहे वह शनि हों, राहु या केतु इत्यादि। इसके अलावा काल सर्पदोष से भी मुक्ति मिलती है। साथ ही प्रेत बांधाएं भी दूर होती हैं। बाबा बटुक नाथ के मस्तक पर स्वयं सूर्य विद्यमान हैं। इसलिए इन्हें ग्रहों का राजा भी कहा जाता है।
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कमच्छा स्थित बाबा बटुक भैरव मंदिर के महंत राकेशपुरी ने बताया कि यह मंदिर 17वीं शताब्दी से पहले का है। इन्हें भगवान शिव का बालरूप माना जाता है। इसीलिए बाबा दरबार में अर्जी लगाने वालों की जल्दी सुनते हैं। बाबा की पूजन विधि में पंचमकार पूजन प्रमुख है। इसके अलावा भक्त टॉफी और बिस्किट भी चढ़ाते हैं। इससे उनकी संतान के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
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जानिए पंचमकार पूजन विधि
बाबा दरबार में पंचमकार या महाचक्र पूजन रोजाना होता है। मानव शरीर जिस तरह से पंचतत्व से बना है। वैसे ही पंचकार पूजन में भी पंचतत्व को शामिल किया जाता है। इनमें मछली को जल का, अंड को अग्नि का, मांस काे सूर्य का और मदिरा को वायु का द्योतक माना गया हैं। इस विधि से पूजन करने से मनुष्य के सारे विकार दूर हो जाते हैं।