फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   banarasi singer rita dev talks about sawan music

प्रकृति से लेकर स्त्री-पुरुष तक के जीवन की वेदना हर लेता है सावन का संगीत

Fri, 14 Jul 2017 05:55 PM IST
amar ujala.com/written by अनूप ओझा
amar ujala.com/written by अनूप ओझा Updated Fri, 14 Jul 2017 05:55 PM IST
विज्ञापन
banarasi singer rita dev talks about sawan music
बनारस घराने की गायिका रीता देब - फोटो : अमर उजाला
सावन महिलाओं के लिए बहुत खास होता है। तपती हुई प्रकृति और जीवन दोनों को शीतल बना देने की क्षमता इसी मास में होती है। महिलाओं को बारिश क ी तरह ही परदेस कमाने गए प्रियतम का बेसब्री से इंतजार होता है। ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु के आगमन पर प्रियतम के पास न होने का विरह सावन का संगीत है। आनंद, उमंग लेकर आता है सावन। चारों तरफ हरियाली छा जाती है। बादलों की उमड़-घुमड़, मोर-पपीहे के शोर से पता चलता है कि खग-विहग के लिए भी सावन सुहावना होता है। स्त्रियों के ससुराल से नैहर तक झूले पड़ जाते हैं और हर दिल में खुशियां छा जाती हैं...। 
विज्ञापन



बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की चमक, सावन की रिमझिम फुहारें हर विरहिणी को सताती हैं। अकेलापन उससे सहा नहीं जाता। सूनी सेज उसे काटने दौड़ती है। ऐसे भाव सावन के लोकगीतों में सहज ही मिलते हैं। यह कहना है बनारस घराने की गायिका रीता देब का।
विज्ञापन


वह राग पीलू में बड़े रामदास की कजरी के भावों से इसका एहसास कराती हैं। सजनी छाई घटा घनघोर हमरे संवरिया नहिं आए.... बादर गरजे बिजुरी चमके तड़पत है जिया मोर...। वे कहती हैं कि चारों तरफ घटा छा जाती है। बारिश की तरह पिया का भी उसे इंतजार रहता है। उमंग उठती है तो कहती कि हमसे रहा नहीं जा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


दादुर, मोर, पपीहा, कोयल शोर मचा रहे हैं। आप ही नहीं है... आप कब आओगे...। रीता इसी राग में दूसरी बंदिश का उदाहरण देती हैं- सावन लागो सुहाई हो पियरवा... मन सेज घेरि घटा नभ छाई हो पियरवा... रस बरसत झर लाई हो पियरवा..  पीहू पीहू कोकिल मोर पुकारत, सुनि सुनि जिया तरसाई हो पियरवा...। 
रीता बताती हैं कि इस मौसम की फुहारों से नायिका का भीग जाना उसकी विरह वेदना और बढ़ा देता है।

वह कजरी की दूसरी बंदिश गुनगुनाती हैं- बरसे कारी रे बदरिया मोरि चुनरिया भीगी जाए... धानी रंग चुनरी लाल रंग चोलिया... बूंद पड़त धूमिल होइ जाए... पइयां पड़ूं मैं बांके छयलवा लिए जा गरवा लगाए...। यानी बारिश हो रही है और राधा भीग रही हैं। वे कृष्ण से कहती हैं कि हमारे कपड़े भीग गए हैं। मैं आपके पांव पड़ती हूं।

आप मुझे गले लगा लीजिए, आप मेरे पास आ जाइए। वह कजरी में प्रेम की गहरी अनुभूति को आगे बढ़ाती हैं- ओ कारे भंवरा तू तो जुलुम किया/एक तो कारी रात, दूजे पिया परदेस तीजे बदरा रे बरसावे बुंदिया... बादर गरजे घनघोर बिजुरी चमके चंहुओर, सूनी सेजिया पे मोरा धड़के जिया...कोयल कुहुंक सुनाए पपिहा शोर मचाए, बैरी निंदिया रे नहिं आवे अंखिया...।


रीता कहती हैं कि पुरुषों के भाव भी कजरी में मिलते हैं। जैसे- काहे करेलू गुमान गोरी सावन में/छाई घटा घनघोर बिजुरी चमके चहुंओर, पड़े बूंदन फुहार गोरी सावन में... अंखिया तोरी है कंटीली बतिया बड़ी है रसीली... चला चलीं गोरी झूम-झूम सावन में...। 


 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed