बनारस छूट जाएगा तो कलम... : साहित्यकार सूर्यबाला हुईं भावुक, बोलीं- आधुनिकता के नाम पर लोग पाल रहे हैं भ्रम
Varanasi News : मुंबई में रहने वाली साहित्यकार सूर्यबाला आज भी बनारस की ही बेटी कही जाती हैं। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की। कई पुस्तकें ऐसी हैं, जिनमें बनारस की संस्कृति साफ झलकती है। अमर उजाला से उन्होंने खास बातचीत की। आइए जानते हैं बातचीत के अंश...
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प्रख्यात साहित्यकार सूर्यबाला ने कहा कि बनारस हमारी नजर में नहीं हृदय में बसता है, जिस दिन बनारस मुझसे छूट जाएगा, उस दिन मुझसे कलम छूट जाएगी। क्योंकि मेरा जन्म से लेकर बचपन यहां गुजरा है।
किसी भी व्यक्ति के जीवन के लिए बचपन अहम होता है। उसके बचपन और स्मृति कोष उसे पूरे जीवन के लिए संस्कार के साथ जीना सिखाती है। ठीक समय पर उसे रास्ता भी दिखा देता है।
मुंबई में रह रहीं बनारस की बेटी सूर्यबाला के उपन्यास 'कौन देस को वासी: वेणु की डायरी' को केके बिड़ला फाउंडेशन द्वारा व्यास सम्मान के लिए नामित किया गया है। 25 अक्तूबर 1943 को वाराणसी में जन्मी सूर्यबाला छवीं कक्षा से ही साहित्य सृजन शुरू कर दिया था।
सबसे अधिक प्रेरणा घर से मिली। बीएचयू से हिंदी साहित्य में पीएचडी कीं। वह अभी आत्म संस्मारण 'सैदपुर में शेक्सपियर अंकल बनाम डिप साहब की तीसरी बेटी'' लिख रही हैं। उनका पहला उपन्यास 1975 में 'मेरे संधि पत्र' प्रकाशित हुआ। उनकी करीब दो दर्जन कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
'अमर उजाला' से बातचीत उन्होंने कहा कि बनारस में भारतीय दर्शन महसूस होता है। क्योंकि बचपन में यहां पढ़ाई के दौरान जो हमने देखा और मससूस किया, वह और कहीं नहीं मिलेगा। मुझे कभी नहीं लगा कि यहां भाषा से कोई घृणा या पराया समझता हो।
सूर्यबाला ने बताया कि मैं जब भी बनारस में आईं तटस्थ होकर बनारस पर लिखा है। इसको 'यादों के शिलालेख' पुस्तक में जिक्र किया है, जो शीघ्र आने वाली है। इसमें यहां की अच्छाई के साथ यहां की व्यवस्था का भी जीक्र है।
मुंशी प्रेमचंद, जयंशकर प्रसाद की कहानियां हैं ऊर्जा के स्रोत
सूर्यबााला ने बनारस के साहित्य पर कहा कि यहां पर किसी एक साहित्यकार से ऊर्जा का स्रोत नही कहा जा सकता है। मुंशी प्रेमचंद की 'बड़े भाई साहब', 'अकबरी लोटा', 'गोदान', जयंशकर प्रसाद की 'कामायनी' की कहानियों से हमें ऊर्जा मिला। चंदन शर्मा गुलेरी, बीरबाला आदि साहित्यकारों ने हमें प्रभावित किया।
आधुनिकता के नाम पर बड़ा भ्रम
सूर्यबाला ने कहा कि आधुनिकता के नाम पर लोग बहुत बड़ी भ्रम पाले जा रहे हैं। वह अपनी भाषा, संस्कृति, सोच के मूलभूत धारणाओं को भूलकर अपने अंदर हीनभावना पालकर जी रहे हैं, जो चिंतनीय है। हमें अपने मूल को समझना होगा। भारत से किसी दूसरे देश में जाकर रह रहे लोगों के सामने वहां के समाज, संस्कृति के साथ अपनी संस्कृति को संभाल कर रखना चाहिए। तभी वहां के लोग हमारी संस्कृति से प्रभावित होंगे। जब वह हमारी संस्कृति की प्रशंसा करेंगे तो इसके अलग मायने निकलते हैं।
प्रकृति से स्त्री को मिले गुण को न छोड़े स्त्री
स्त्री विमर्श पर सूर्यबाला ने कहा कि स्त्री मुक्ति, चेतना और सामर्थ का अर्थ अभी तक समझा नहीं गया। इसका गलत अर्थ निकाला गया। 10 से 15 फीसदी स्त्रीयां व युवतियां हैं, जो संस्कारों व संस्कृतियों को छोड़कर आधुनिकता के साथ जी रही हैं। बाकी इसको अपना रही हैं, जो गलत है। यही वजह है कि वह न इधर की हो रही है न उधर की। कहा कि वह अपनी आत्म शक्ति को नहीं समझती है। उसे प्रकृति प्रद्त्त गुण मिले हैं, जिसे उसे नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि आधुनिकता को लेकर गलत प्रभाव देखा जा रहा है। इसके कोई न अर्थ निकल रहे हैं और न समाधान।
पर्यटकों की नजर में बनारस को सुंदर बनाएं
श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के अलंकृत होने के बाद से जो बनारस में अर्थलोभ की भावना के बढ़े प्रभाव पर सूर्यबाला ने कहा कि सरकार ने बनारस को सुंदर बना दिया है, मगर दुकानदारों, मछुआरों के मनमाने पैसे लेना अच्छा नहीं है। अभी जो मेरे चरित्र में आना चाहिए, वह नहीं दिखता है। यह हमारे चरित्र और संस्कार नहीं रहे हैं। अपनी संस्कृति के अनुरूप परिचय देते हुए ऐसा करें कि पर्यटकों की नजर में काशी सुंदर लगे। उन्होंने पाठ्यक्रमों नैतिक शिक्षा को भी शामिल कर पढ़ाने पर जोर दिया।
व्यंग्य गंभीर विधा
सूर्यबाला गंभीर विषयों के साथ हास्य-व्यंग्य भी लिखती हैं। कहा कि व्यंग्य सकारात्मक व गंभीर विधा है, जो मनुष्य के अंदर व बाहर की विविधताओं को बाहर लाने व दिखाने में मदद करता है। हास्य व्यंग्य का सारथी है। अभी लिख रही हैं आत्म संस्मारण- सैदपुर में शेक्सपियर अंकल बनाम डिप साहब की तीसरी बेटी। इसमें कुछ ही कल्पना नहीं है। इसपर सोच विचार पत्रिका ने विशेषांक प्रकाशित किया था।
बीएचयू से हिंदी साहित्य में पीएचडी की। यहां आर्य महिला पीजी कॉलेज में अध्यापन भी किया। 1975में पहला उपन्यास मेरे संधि पत्र प्रकाशित हुआ। उनकी करीब दो दर्जन कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
रत्नादेवी गोयनका वाग्देवी पुरस्कार, हरिशंकर परसाई स्मृति सम्मान, महाराष्ट्र साहित्य अकादमी का राज्यस्तरीय सम्मान, महाराष्ट्र साहितय अकादमी सवोच्च शिखर सम्मान, राष्ट्रीय शरद जोशी पुरस्कार, भारतीय प्रसार-परिषद का भारती गौरव सम्मान आदि प्राप्त कर हो चुका है।