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दुनिया में बनारस घराने को दिलाई थी पहचान, हनुमत दरबार से ही शुरू हुई पं. राजन मिश्र की संगीत यात्रा

Mon, 26 Apr 2021 12:43 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Mon, 26 Apr 2021 12:43 PM IST
सार

समेटे हुए थे चार सौ सालों के संगीत की परंपरा
कहते थे पंडित राजन मिश्र, सही उच्चारण और राग की मर्यादा है बनारस की खासियत
 

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Banaras Gharana was recognized in the world, Pandit Rajan Mishra's musical journey started from Hanumat Darbar
राजन मिश्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र ने कहा कि दुनिया में बनारस घराने का आज जो नाम और शोहरत है उसमें प. राजन-साजन मिश्र का सबसे बड़ा योगदान है। पद्मविभूषण गिरिजा देवी के बाद दोनों भाईयों ने शास्त्रीय संगीत के जरिए बनारस घराने का नाम दुनिया भर में रौशन किया।
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महंत प्रो. मिश्र ने कहा कि पं. राजन मिश्र का असमय चले जाना हमारे परिवार की व्यक्तिगत क्षति है। वह बड़े रामदास जी की परंपरा के ध्वज वाहक थे। हम लोगों से खानदानी जुड़ाव रहा है। उनके संगीत केयात्रा की शुरूआत संकटमोचन संगीत समारोह से हुई थी। अभी कुछ दिनों पहले बात हुई थी तो उन्होंने कहा कि इस बार संगीत समारोह के दौरान हनुमत लला के दरबार में हाजिरी लगाएंगे, लेकिन यह इच्छा उनके साथ ही चली गई।
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1949 के संकटमोचन संगीत समारोह में पं. राजन-साजन मिश्र ने पहली प्रस्तुति दी थी। भोर में वह गाने के लिए बैठे थे। उस दिन पं. रविशंकर का जन्मदिन था। वह भी हनुमान जी का दर्शन करने आए और जब उन्होंने दोनों भाईयों का गाना सुना तो वह आकर बैठ गए। उनको गाना बहुत पसंद आया।
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वहीं से उन्होंने दोनों भाईयों के संगीत कार्यक्रम की बुकिंग की। इसके बाद जो संगीत का सफर शुरू हुआ वह शिखर तक पहुंचा। पं. राजन मिश्र के जाने के बाद जोड़ी तो बिछड़ गई। दोनों भाईयों में बहुत अच्छा समन्वय था। पं. मिश्र रहते तो दिल्ली में थे लेकिन मिजाज पूरा बनारसी था। उनका हृदय बनारस में ही रहता था। अक्सर बनारस का हालचाल लिया करते थे।
 

दोनों भाईयों के जुगलबंदी की दीवानी थी दुनिया, उमड़ती थी भीड़
 बनारस घराने को दुनिया भर में पहचान दिलाने वाले पं. राजन मिश्र-साजन मिश्र का अलग ही स्थान है। दोनों भाईयों की जुगलबंदी की दुनिया दीवानी थी। जब वह मंच पर आते थे तो उनको सुनने के लिए भीड़ उमड़ती थी। पद्मश्री डॉ. सोमा घोष ने बताया कि उनके घराने ने 400 साल का इतिहास समेटा हुआ था। उनके दादा पंडित बड़े राम मिश्र और पिता पंडित हनुमान मिश्र, चाचाजी गोपाल मिश्र सहित इनके परदादा भी संगीतकार थे।

राजन मिश्रा का मानना था कि बनारस एकमात्र घराना है, जहां संगीत की तीनों विधाएं गायन, वादन और नर्तन मौजूद हैं। ऐसा दूसरे घरानों में नहीं पाया जाता। उन्होंने 1978 में श्रीलंका में अपना पहला संगीत का कार्यक्रम किया और इसके बाद उन्होंने जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड, यूएसए, सिंगापुर, कतर, बांग्लादेश और दुनिया भर के कई देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया।

दोनों भाईयों के जुगलबंदी की दुनिया दीवानी थी। दोनों की आवाज भले अलग-अलग थी लेकिन जब एक साथ प्रस्तुति दी जाती थी तो दोनों दो जिस्म एक जान हो जाते थे। पं. राजन मिश्र के जाने के बाद वह जुगलबंदी टूट गई है। तबलावादक पं. रजनीश मिश्र ने बताया कि दोनों भाई पहलवानी केभी शौकीन थे। एक साक्षात्कार के दौरान पं. राजन मिश्र ने बताया था कि उन्हें खेलों के साथ ही प्रकृति के बीच रहना बेहद पंसद है। पं. राजन मिश्र का मानना था कि सही उच्चारण और राग की मर्यादा ही बनारस घराने की खासियत है।

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