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कारगिल विजय दिवसः जन्मदिन के दिन शहीद हुआ था आजमगढ़ का लाल
क्राइम डेस्क, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Thu, 26 Jul 2018 12:38 PM IST
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शहीद रामसमुझ यादव
- फोटो : file photo
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यूपी के आजमगढ़ जिले के रामसमुझ यादव ने जिस तारीख को उनका जन्म लिया उसी तारीख को ही 22 वर्ष की उम्र में अपने प्राण देश के लिए न्यौछाबर कर दिए। परिवार वालों को बेटे के बलिदान पर गर्व है।
वहीं उस मां के दर्द को कोई बयां भी नहीं किया सकता है, जिसके बेटे ने भरी जवानी में अपने प्राण देश की सुरक्षा के लिए गवां दिए हो। पिता का दर्द भी कम नहीं होगा क्योंकि उन्होंने अपने जवान बेटे की अर्थी को कंधा दिया हो। सरकार ने परिवार के लिए बहुत कुछ दिया लेकिन आज भी परिवार को शहीद रामसमुझ यादव की कमी खलती है।
जिले के सगड़ी तहसील के नत्थूपुर गांव में आर्थिक रूप से पिछड़े राजनाथ यादव के परिवार में रामसमुझ यादव 30 अगस्त 1977 को जन्म लिया था। घर के बड़े बेटे होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने कड़ी मेहनत और मजदूरी कर अपनी पढ़ाई को पूरी की।
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उनके मन में देश सेवा की भावना प्रबल थी। इस जज्बे को परवान चढ़ाने के लिए उन्होंने 1997 में आर्मी ज्वाइन की। उनके आर्मी ज्वाइन करने के बाद घर की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। छोटे भाई प्रमोद यादव, छोटी बहन मीना की पढ़ाई आराम से होने लगी। अब परिवार के लोग उनकी शादी के लिए लड़की तलाश करने लगे थे।
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वहीं उस मां के दर्द को कोई बयां भी नहीं किया सकता है, जिसके बेटे ने भरी जवानी में अपने प्राण देश की सुरक्षा के लिए गवां दिए हो। पिता का दर्द भी कम नहीं होगा क्योंकि उन्होंने अपने जवान बेटे की अर्थी को कंधा दिया हो। सरकार ने परिवार के लिए बहुत कुछ दिया लेकिन आज भी परिवार को शहीद रामसमुझ यादव की कमी खलती है।
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जिले के सगड़ी तहसील के नत्थूपुर गांव में आर्थिक रूप से पिछड़े राजनाथ यादव के परिवार में रामसमुझ यादव 30 अगस्त 1977 को जन्म लिया था। घर के बड़े बेटे होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने कड़ी मेहनत और मजदूरी कर अपनी पढ़ाई को पूरी की।
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उनके मन में देश सेवा की भावना प्रबल थी। इस जज्बे को परवान चढ़ाने के लिए उन्होंने 1997 में आर्मी ज्वाइन की। उनके आर्मी ज्वाइन करने के बाद घर की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। छोटे भाई प्रमोद यादव, छोटी बहन मीना की पढ़ाई आराम से होने लगी। अब परिवार के लोग उनकी शादी के लिए लड़की तलाश करने लगे थे।
परिवार के लोगों को शहीद रामसमुझ की कमी हर समय खलती
शहीद रामसमुझ यादव की लगाई गई प्रतिमा
- फोटो : अमर उजाला
इसी दौरान 1999 में कारगिल की जंग शुरू हो गई। इनकी पल्टन को भी युद्ध में भेज दिया गया। जहां इन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों से लोहा लिया। 30 अगस्त 1999 को लड़ते हुए शहीद हो गए। उनके शहीद होने की खबर से पूरा परिवार हतप्रभ रह गया।
सरकार ने परिवार को अपनी ओर से 18 से 20 लाख रुपये, 22 विस्वा जमीन और गैस एजेंसी दिया। वहीं रामसमुझ की बटालियन के जवानों ने अपने पैसे से उनके परिवार को शहीद आवास बनवाकर दिया। आज पूरा परिवार सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है। लेकिन परिवार के लोगों को शहीद रामसमुझ की कमी हर समय खलती है।
माता प्रतापी देवी को उनकी तस्वीर की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखती है। ऐसा लगता है जैसे वह शहीद पुत्र से इस तरह चले जाने के कारण नाराज हो। वह अपना दर्द भी किसी से बयां नहीं करती हैं।
उनके पिता राजनाथ यादव लोगों से घुलते मिलते हैं लेकिन सीने में पुत्र के जाने का दर्द वह अपने सीने में दबाए हुए हैं। उन्हें अपने पुत्र के देश के लिए शहीद होने का गर्व तो है लेकिन उसके न होने का गम भी है।
सरकार ने परिवार को अपनी ओर से 18 से 20 लाख रुपये, 22 विस्वा जमीन और गैस एजेंसी दिया। वहीं रामसमुझ की बटालियन के जवानों ने अपने पैसे से उनके परिवार को शहीद आवास बनवाकर दिया। आज पूरा परिवार सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है। लेकिन परिवार के लोगों को शहीद रामसमुझ की कमी हर समय खलती है।
माता प्रतापी देवी को उनकी तस्वीर की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखती है। ऐसा लगता है जैसे वह शहीद पुत्र से इस तरह चले जाने के कारण नाराज हो। वह अपना दर्द भी किसी से बयां नहीं करती हैं।
उनके पिता राजनाथ यादव लोगों से घुलते मिलते हैं लेकिन सीने में पुत्र के जाने का दर्द वह अपने सीने में दबाए हुए हैं। उन्हें अपने पुत्र के देश के लिए शहीद होने का गर्व तो है लेकिन उसके न होने का गम भी है।