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स्मृति शेषः जब अटल जी ने मंच को बताया था मचान, सभा में मौजूद लोगों ने लगाए जमकर ठहाके
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 17 Aug 2018 10:20 AM IST
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1968 में चकिया और 1969 में पंडित दीन दयाल नगर में आए थे अटल
- फोटो : अमर उजाला
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जनसंघ और भाजपा के विभिन्न पदों पर रहते हुए कई बार चंदौली आए। पहली बार 1968 में चकिया में आयोजित एक सभा में वे शामिल हुए थे। पांच फरवरी 1969 में नगर पालिका इंटर कालेज मैदान में आए थे, उस समय वे जन संघ के अध्यक्ष थे। इंटर कालेज के मैदान पर काफी ऊचे बने मंच पर बैठने के बाद उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं से हंसी के लहजे में कहा कि मंच है कि मचान बनाया गया है। इस पर लोगों ने खूब ठहाके लगाए थे।
तत्कालीन जनसंघ के नगर महामंत्री मोहन लाल चौरसिया ने बताया कि मध्यावधि चुनाव के दौरान आयोजित रैली में तब भाग लेने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी आए थे। उनकी सभा की बहुत बातें भूल गए हैं लेकिन उनकी एक बात आज तक याद है, वह है कि उस समय उन्होंने रैली के लिए बने मंच को मचान बताया था।
कारण कि मंच काफी ऊंचाई पर बन गया था। तब उन्होंने मचान बताकर लोगों को खूब हंसाया और उपस्थित लोगों का दिल जीत लिया था। वहीं मुगलसराय स्टेशन पर पंडित दीन दयाल उपाध्याय के शव की शिनाख्त करने वाले स्व. गुरुबख्श कपाही के पुत्र सुरेश कपाही ने बताया कि 1998 में वाराणसी में आयोजित चुनावी रैली में बतौर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर रहते हुए आए थे। वे मुगलसराय नगर के प्रभाष अग्रवाल के घर आए थे। जिसके बाद वह दो मिनट के लिए पिता गुरुबख्श कपाही से मिलने के लिए आए थे।
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भाजपा के जिला उपाध्यक्ष उमाशंकर सिंह ने बताया कि 1968 में चकिया स्थित काली जी मंदिर परिसर में आयोजित सभा में शामिल हुए थे। चाचा एवं जनसंघ के स्वयं सेवक अधिवक्ता स्व. कमला सिंह ने अटल बिहारी वाजपेेयी की मौजूदगी में 5100 रुपये पार्टी के लिए भेंट किए थे। सभा के बाद अटल जी झंडा गली स्थित उनके आवास पर भी गए थे। इस दौरान वह जनसंघ के प्रचारक नियामताबाद गांव के स्व. झामर सिंह के आवास पर भी दो बार रुके थे।
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तत्कालीन जनसंघ के नगर महामंत्री मोहन लाल चौरसिया ने बताया कि मध्यावधि चुनाव के दौरान आयोजित रैली में तब भाग लेने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी आए थे। उनकी सभा की बहुत बातें भूल गए हैं लेकिन उनकी एक बात आज तक याद है, वह है कि उस समय उन्होंने रैली के लिए बने मंच को मचान बताया था।
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कारण कि मंच काफी ऊंचाई पर बन गया था। तब उन्होंने मचान बताकर लोगों को खूब हंसाया और उपस्थित लोगों का दिल जीत लिया था। वहीं मुगलसराय स्टेशन पर पंडित दीन दयाल उपाध्याय के शव की शिनाख्त करने वाले स्व. गुरुबख्श कपाही के पुत्र सुरेश कपाही ने बताया कि 1998 में वाराणसी में आयोजित चुनावी रैली में बतौर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर रहते हुए आए थे। वे मुगलसराय नगर के प्रभाष अग्रवाल के घर आए थे। जिसके बाद वह दो मिनट के लिए पिता गुरुबख्श कपाही से मिलने के लिए आए थे।
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भाजपा के जिला उपाध्यक्ष उमाशंकर सिंह ने बताया कि 1968 में चकिया स्थित काली जी मंदिर परिसर में आयोजित सभा में शामिल हुए थे। चाचा एवं जनसंघ के स्वयं सेवक अधिवक्ता स्व. कमला सिंह ने अटल बिहारी वाजपेेयी की मौजूदगी में 5100 रुपये पार्टी के लिए भेंट किए थे। सभा के बाद अटल जी झंडा गली स्थित उनके आवास पर भी गए थे। इस दौरान वह जनसंघ के प्रचारक नियामताबाद गांव के स्व. झामर सिंह के आवास पर भी दो बार रुके थे।
कालीन नगरी से रहा अटल का सरोकार
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का कालीन नगरी से गहरा सरोकार रहा है। सन 1998 में विभूति नारायण राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान में आयोजित जनसभा में उन्हें सुनने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा था। आधे घंटे के लिए समूचा ज्ञानपुर नगर मानो ठहर सा गया था। सभा में जनता ने ध्यानमग्न होकर अटल जी की एक-एक बात को सुना थे। इसके पूर्व वह जनसंघ के प्रचार के लिए जिले में तीन बार आए थे।
बृहस्पतिवार को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन रक्षक प्रणाली पर रखे जाने की खबर पाकर सुबह से ही प्रशंसक उनकी सलामती के लिए दुआएं मांगने लगे। हालांकि शाम पांच बजे के आसपास निधन की खबर मिलते ही प्रशंसक मायूस हो गए। हर कोई उन्हें याद करता दिखा। जिले में उनके आगमन और देशहित के लिए उठाए गए उनके कदमों के बारे में लोग चर्चा करते रहे।
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने बताया कि सांसद वीरेंद्र सिंह के चुनाव प्रचार के लिए 1998 में जब बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जीआईसी मैदान में सभा को संबोधित करने आए तो पूरा जिला उमड़ पड़ा था। अटल जी को सुनने के लिए लोग जगह न मिलने पर आसपास के घरों पर चढ़ गए थे।
भीड़ इस कदर हो गई थी कि ज्ञानपुर नगर की रफ्तार एकबारगी मानो थम सी गई। इसके पूर्व 1996 में राष्ट्रीय इंटर कॉलेज में अटल जी को आना था, लेकिन स्वास्थ्य खराब होने की वजह से नहीं आ सके थे। इसके बाद उनका पत्र जिले में आया था।
कौलापुर निवासी सरयूनाथ शुक्ला ने बताया कि जनसंघ की स्थापना के बाद जिले में प्रचार के लिए अटल जी वर्ष 1961, 1962 और 1971 में आए थे। उस समय भी उनकी लोकप्रियता गजब की थी। ज्ञानपुर के बुजुर्ग प्रकाश अंबष्ट बताते हैं कि उनके पिता रामदेव अंबष्ट के यहां पूर्व प्रधानमंत्री एक बार कुछ समय के लिए रुके थे। उस समय वह मुखर्जी पार्क में आयोजित जनसंघ की सभा में शामिल होने आए थे।
बृहस्पतिवार को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन रक्षक प्रणाली पर रखे जाने की खबर पाकर सुबह से ही प्रशंसक उनकी सलामती के लिए दुआएं मांगने लगे। हालांकि शाम पांच बजे के आसपास निधन की खबर मिलते ही प्रशंसक मायूस हो गए। हर कोई उन्हें याद करता दिखा। जिले में उनके आगमन और देशहित के लिए उठाए गए उनके कदमों के बारे में लोग चर्चा करते रहे।
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने बताया कि सांसद वीरेंद्र सिंह के चुनाव प्रचार के लिए 1998 में जब बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जीआईसी मैदान में सभा को संबोधित करने आए तो पूरा जिला उमड़ पड़ा था। अटल जी को सुनने के लिए लोग जगह न मिलने पर आसपास के घरों पर चढ़ गए थे।
भीड़ इस कदर हो गई थी कि ज्ञानपुर नगर की रफ्तार एकबारगी मानो थम सी गई। इसके पूर्व 1996 में राष्ट्रीय इंटर कॉलेज में अटल जी को आना था, लेकिन स्वास्थ्य खराब होने की वजह से नहीं आ सके थे। इसके बाद उनका पत्र जिले में आया था।
कौलापुर निवासी सरयूनाथ शुक्ला ने बताया कि जनसंघ की स्थापना के बाद जिले में प्रचार के लिए अटल जी वर्ष 1961, 1962 और 1971 में आए थे। उस समय भी उनकी लोकप्रियता गजब की थी। ज्ञानपुर के बुजुर्ग प्रकाश अंबष्ट बताते हैं कि उनके पिता रामदेव अंबष्ट के यहां पूर्व प्रधानमंत्री एक बार कुछ समय के लिए रुके थे। उस समय वह मुखर्जी पार्क में आयोजित जनसंघ की सभा में शामिल होने आए थे।
विरोध के चलते नहीं कर पाए थे आंबेडकर प्रतिमा का शिलान्यास
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आजमगढ़से गहरा रिश्ता था। उन्होंने कई बार जनपद का दौरा किया था। वर्ष 1984-85 में विरोध के चलते आंबेडकर पार्क में प्रतिमा का शिलान्यास नहीं कर पाए थे। वर्ष 1996 में जजी मैदान में ऐतिहासिक रैली भी की थी। जेपी आंदोलन के समय भी राजमाता विजया राजे सिंधिया के साथ पहुंचे थे। इस दौरान एक दुकान के उद्घाटन के समय पेड़ों की खूब प्रशंसा की थी।
बिलरियागंज ब्लाक के मानपुर निवासी महातम राय से अटल जी का खास लगाव था। वो उन्हें अपना मित्र कहकर संबोधित करते थे। अटलजी से नजदीकी ही थी कि महातम राय की पुत्री कुसुम राय राजनीति में शिखर तक पहुंचीं और राज्यसभा की सांसद भी रहीं। जेपी आंदोलन के समय 1977 में भी अटली जी जनपद पहुंचे थे। उस दौरान वो मारवाड़ी धर्मशाला के पास द्वारिका प्रसाद सर्राफ के पास रुके थे। उनके साथ राजमाता विजया राजे सिंधिया भी थी।
उन्होंने मातवरगंज में सत्य नारायण गुप्ता (झटकू) की मिष्ठान की दुकान का उद्घाटन भी किया था। दुकान पर बनने वाले पेड़ों की जमकर तारीफ भी की थी। उस समय आस्ट्रेलिया की ईसाई मिशनरियां जनपद में सक्रिय थीं। इनके माध्यम से पेड़ों की पहुंच आस्ट्रेलिया तक थी। वर्ष 1984-85 में अटली जी वर्तमान कलक्ट्रेट भवन के सामने स्थिति आंबेडकर पार्क में प्रतिमा का शिलान्यास करने पहुंचे थे।
वरिष्ठ भाजपा नेता सहजानंद राय और सुनील राय ने बताया कि इस पर उनका विरोध हो हुआ था। अटल जी ने कहा था कि किसी और के हाथों से शिलान्यास करा लें। विरोध के कारण शिलान्यास नहीं हो पाया। इसके बाद वो 1989-90 में भी जनपद आए थे। अंतिम बार उन्होंने वर्ष 1996 में हुए उप चुनाव में जनपद में ऐतिहासिक रैली की थी।
अटलजी वाराणसी से आजमगढ़ आए थे। वर्षों बाद किसी रैली में घंटों देरी से पहुंचे थे। उन्हें देखने के लिए दलीय सीमाएं टूट गई थीं। भारी भीड़ जुटी थी। अपने भाषण में उन्होंने भीड़ देख इस बात को स्वीकार भी किया था। वाराणसी-आजमगढ़ मार्ग पर कहा था कि सड़क गड्ढे में है या गड्ढे में सड़क। ये काफी मशहूर हुआ।
बिलरियागंज ब्लाक के मानपुर निवासी महातम राय से अटल जी का खास लगाव था। वो उन्हें अपना मित्र कहकर संबोधित करते थे। अटलजी से नजदीकी ही थी कि महातम राय की पुत्री कुसुम राय राजनीति में शिखर तक पहुंचीं और राज्यसभा की सांसद भी रहीं। जेपी आंदोलन के समय 1977 में भी अटली जी जनपद पहुंचे थे। उस दौरान वो मारवाड़ी धर्मशाला के पास द्वारिका प्रसाद सर्राफ के पास रुके थे। उनके साथ राजमाता विजया राजे सिंधिया भी थी।
उन्होंने मातवरगंज में सत्य नारायण गुप्ता (झटकू) की मिष्ठान की दुकान का उद्घाटन भी किया था। दुकान पर बनने वाले पेड़ों की जमकर तारीफ भी की थी। उस समय आस्ट्रेलिया की ईसाई मिशनरियां जनपद में सक्रिय थीं। इनके माध्यम से पेड़ों की पहुंच आस्ट्रेलिया तक थी। वर्ष 1984-85 में अटली जी वर्तमान कलक्ट्रेट भवन के सामने स्थिति आंबेडकर पार्क में प्रतिमा का शिलान्यास करने पहुंचे थे।
वरिष्ठ भाजपा नेता सहजानंद राय और सुनील राय ने बताया कि इस पर उनका विरोध हो हुआ था। अटल जी ने कहा था कि किसी और के हाथों से शिलान्यास करा लें। विरोध के कारण शिलान्यास नहीं हो पाया। इसके बाद वो 1989-90 में भी जनपद आए थे। अंतिम बार उन्होंने वर्ष 1996 में हुए उप चुनाव में जनपद में ऐतिहासिक रैली की थी।
अटलजी वाराणसी से आजमगढ़ आए थे। वर्षों बाद किसी रैली में घंटों देरी से पहुंचे थे। उन्हें देखने के लिए दलीय सीमाएं टूट गई थीं। भारी भीड़ जुटी थी। अपने भाषण में उन्होंने भीड़ देख इस बात को स्वीकार भी किया था। वाराणसी-आजमगढ़ मार्ग पर कहा था कि सड़क गड्ढे में है या गड्ढे में सड़क। ये काफी मशहूर हुआ।
बिखरे मतपत्रों को लेकर पैदल गए थे डीएम से शिकायत करने
अटल बिहारी वाजपेयी
भाजपा के शीर्ष नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 1980 और 1985 में मिर्जापुर जिले में आए थे। उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान राजनाथ सिंह के समर्थन में घंटा घर के मैदान पर सभा को संबोधित किया था। उनको सुनने के लिए घंटाघर के मैदान पर हुजूम उमड़ पड़ा था।
सभा में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में राजनाथ सिंह को सांसद चुनने की अपील जनता से की थी। राजनाथ सिंह ने जब दूसरी बार 1985 में मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा तो फिर अटल बिहारी वाजपेयी ने घंटाघर मैदान पर चुनावी सभा को संबोधित किया था। उनका मिर्जापुर से नाता नाता हमेशा बना रहा।
जिले के वरिष्ठ भाजपा नेता पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह डंग ने बताया कि जब 1985 में अटल बिहारी वाजपेयी मिर्जापुर में चुनाव प्रचार करने के लिए आए थे तो उस समय एक दिलचस्प घटना घटी थी। अटल बिहारी वाजपेयी रास्ते से जा रहे थे कि इसी बीच घंटाघर के समीप सड़क के किनारे कुछ मतपत्र बिखरे पड़े थे जिस पर लोगों ने उनका ध्यान आकृष्ट कराया। इसको गंभीरता से लेते हुए अटलबिहारी वाजपेयी सड़क किनारे बिखरे पड़े मतपत्रों को लेकर पैदल ही अपने सहयोगियों के साथ जिलाधिकारी के दफ्तर पहुंचे थे और इसकी शिकायत दर्ज कराई थी।
सभा में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में राजनाथ सिंह को सांसद चुनने की अपील जनता से की थी। राजनाथ सिंह ने जब दूसरी बार 1985 में मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा तो फिर अटल बिहारी वाजपेयी ने घंटाघर मैदान पर चुनावी सभा को संबोधित किया था। उनका मिर्जापुर से नाता नाता हमेशा बना रहा।
जिले के वरिष्ठ भाजपा नेता पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह डंग ने बताया कि जब 1985 में अटल बिहारी वाजपेयी मिर्जापुर में चुनाव प्रचार करने के लिए आए थे तो उस समय एक दिलचस्प घटना घटी थी। अटल बिहारी वाजपेयी रास्ते से जा रहे थे कि इसी बीच घंटाघर के समीप सड़क के किनारे कुछ मतपत्र बिखरे पड़े थे जिस पर लोगों ने उनका ध्यान आकृष्ट कराया। इसको गंभीरता से लेते हुए अटलबिहारी वाजपेयी सड़क किनारे बिखरे पड़े मतपत्रों को लेकर पैदल ही अपने सहयोगियों के साथ जिलाधिकारी के दफ्तर पहुंचे थे और इसकी शिकायत दर्ज कराई थी।
जौनपुर की इमरती की करते थे तारीफ
अटल बिहारी वाजपेयी
- फोटो : amar ujala
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार 1952 में वह जिले में आए और अंतिम बार 1996 में विधानसभा चुनाव के दौरान उनका आना हुआ था। 1963 में लोकसभा के उपचुनाव में पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव संचालन तकरीबन एक माह जिले में रहकर अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था।
चुनाव में वह गली-गली, गांव-गांव गए। यूं कहा जाए तो वह जौनपुर से भलीभांति परिचित हो गए थे। जब भी कोई जौनपुर बड़ा नेता आता था तो उससे कहते थे कि जौनपुर की इमरती खाना न भूलना।
जौनपुर में उनके व्यक्तिगत मित्र भी थे, जिनसे उनका लगाव जीवन पर्यंत बना रहा। इनमें प्रमुख रूप से राजा जौनपुर यादवेंद्र दत्त दुबे और राजा सिंगरामऊ श्रीपाल सिंह थे।
1963 के लोकसभा उपचुनाव में दीनदयाल उपाध्याय चुनाव लड़ रहे थे। उसी दौरान कांग्रेस से राजदेव सिंह भी चुनाव लड़ रहे थे। ओलंदगंज में पाकड़ के पेड़ के पास चाय की दूकान पर राजदेव सिंह लोगों से घिरे थे और बीड़ी पी रहे थे। इसी दौरान दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी वहां पहुंच गए।
उन्होंने लोगों से पूछा कि यह बीड़ी पी रहा व्यक्ति कौन है। लोगों ने बताया कि यह कांग्रेस प्रत्याशी राजदेव सिंह है। इस पर दीनदयाल जी ने कहा कि इतना लोकप्रिय व्यक्ति से कैसे मैं चुनाव जीत सकता हूं। राजा जौनपुर भी उनके साथ में थे।
चुनाव में वह गली-गली, गांव-गांव गए। यूं कहा जाए तो वह जौनपुर से भलीभांति परिचित हो गए थे। जब भी कोई जौनपुर बड़ा नेता आता था तो उससे कहते थे कि जौनपुर की इमरती खाना न भूलना।
जौनपुर में उनके व्यक्तिगत मित्र भी थे, जिनसे उनका लगाव जीवन पर्यंत बना रहा। इनमें प्रमुख रूप से राजा जौनपुर यादवेंद्र दत्त दुबे और राजा सिंगरामऊ श्रीपाल सिंह थे।
1963 के लोकसभा उपचुनाव में दीनदयाल उपाध्याय चुनाव लड़ रहे थे। उसी दौरान कांग्रेस से राजदेव सिंह भी चुनाव लड़ रहे थे। ओलंदगंज में पाकड़ के पेड़ के पास चाय की दूकान पर राजदेव सिंह लोगों से घिरे थे और बीड़ी पी रहे थे। इसी दौरान दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी वहां पहुंच गए।
उन्होंने लोगों से पूछा कि यह बीड़ी पी रहा व्यक्ति कौन है। लोगों ने बताया कि यह कांग्रेस प्रत्याशी राजदेव सिंह है। इस पर दीनदयाल जी ने कहा कि इतना लोकप्रिय व्यक्ति से कैसे मैं चुनाव जीत सकता हूं। राजा जौनपुर भी उनके साथ में थे।
सबके प्रिय अटल जी...उनके जैसा कोई आया नहीं
atal bihari
- फोटो : अमर उजाला
आजमगढ़ के ठेकमा बाजार निवासी एवं संस्कार भारती वाराणसी के विद्यार्थी रहे मुनेंद्र मोहन सिंह ने अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि अटल जी...भारत रत्न अटलजी...अजातशत्रु अटल जी...सबके प्रिय अटलजी....व्यक्तित्व और कृतित्व को कोटिश: नमन। उनके जैसा कोई आया नहीं...उनकी जगह खाली है और खाली ही रहेगी। हमारी स्मृतियों में हमेशा अमिट रहेंगे।
अटलजी से जुड़ी सुखद स्मृतियां को संजोते हुए उन्होंने कहा कि मुझ जैसे सामान्य कार्यकर्त्ता को दो बार काशी में अटलजी के मंच पर उपस्थित होने का अवसर प्राप्त हुआ। पहली बार फ़रवरी 1992 में काशी में संस्कार भारती के राष्ट्रीय कला साधक संगम में मुख्य अतिथि के रूप में वो आए थे।
दूसरी बार फ़रवरी 1996 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय छात्रसंघ उद्घाटन पर उनके सामने मंच पर मुझे गीत गाने का सौभाग्य मिला था। ...देश का युग का तुझी पर ध्यान है...तरुण तेरे तेज का आह्वान है...मेरा गाया ये गीत अटलजी ने आंखें बंद करके और हाथों से ताल देकर सुनी थी। वो पल मेरे लिए अविस्मरणीय और अद्भुत हैं।
अटलजी से जुड़ी सुखद स्मृतियां को संजोते हुए उन्होंने कहा कि मुझ जैसे सामान्य कार्यकर्त्ता को दो बार काशी में अटलजी के मंच पर उपस्थित होने का अवसर प्राप्त हुआ। पहली बार फ़रवरी 1992 में काशी में संस्कार भारती के राष्ट्रीय कला साधक संगम में मुख्य अतिथि के रूप में वो आए थे।
दूसरी बार फ़रवरी 1996 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय छात्रसंघ उद्घाटन पर उनके सामने मंच पर मुझे गीत गाने का सौभाग्य मिला था। ...देश का युग का तुझी पर ध्यान है...तरुण तेरे तेज का आह्वान है...मेरा गाया ये गीत अटलजी ने आंखें बंद करके और हाथों से ताल देकर सुनी थी। वो पल मेरे लिए अविस्मरणीय और अद्भुत हैं।