तानों के बीच थिरके सपने: काशी के आशीष ढाई दशक में 2000 बच्चों को सिखा चुके हैं कथक, संघर्षपूर्ण रहा है सफर
आलोचना और उपहास से लड़ते हुए आशीष सिंह उर्फ नृत्य मंजरी दास ने यह साबित कर दिया कि हुनर की आवाज को कोई दबा नहीं सकता है। तानों और मजाक को ताकत बनाकर अपने कदमों से उम्मीद व जुनून की नई राह बनाई।
विस्तार
घर में बर्थडे पार्टी पर मैं डांस कर रहा था, तभी दादाजी आ गए। मुझे गुस्से भरी निगाहों से देखा...कहने लगे- नाचने के अलावा और कोई काम नहीं करता। दादी ललिता सिंह की बहनें भी ताना मारतीं थीं। कहतीं कि इ कइसन नाचत हौ...। इस पर दादी उनसे कहतीं कि गणेश मंदिर में कलाकार आयल रहलन, आनहने क नकल करत हौ।
2010 में नृत्य की शिक्षा प्राप्त करते समय बड़े गुरु ने यहां तक कह दिया था कि जेंडर बदल लो। मुझे कहा जाता यह तो लड़कियों की तरह मटकता है, कहीं सही में लड़की ही तो नहीं है। कुछ लोग मुझे आगे बढ़ते, मेरा नाम होते नहीं देख पा रहे थे, फिर भी मैं निराश नहीं हुआ।
यह कहना है कि कथक डांसर आशीष सिंह का। ढाई दशक से कथक की कला का आगे बढ़ा रहे आशीष अब उन बातों को कम याद करते हैं, जो ताने की तरह सुनने को मिलती थीं। वे लगभग 2000 बच्चों को कथक सीखा चुके हैं। भारत के इस फन को आगे बढ़ाने के लिए वे वृंदावन चले गए, लेकिन अपनी काशी को आज भी महसूस करते हैं।
बनारस के बीएलडब्ल्यू की रहने वाली सरला नारायण सिंह ने जब आशीष अपनी गोद में लेकर कथक किया तब उन्होंने भी नहीं सोचा था कि वे एक फनकार को अपने साथ लिए हुए हैं। आशीष बताते हैं कि सरला मैम से ही उन्होंने कथक की कला सीखी।
जानी-मानी गायिका बागेश्वरी देवी गायिका और उनके शिष्य सुनील सिंह गायक ने आशीष के घर पर एक आयोजन किया था। 90 के दशक में हुए इस आयोजन में बनारस के कई कलाकार शरीख हुए...अपना फन दिखाया। चाचा सुनील सिंह ने आशीष काफी प्रभावित थे। दादा स्व. रामप्रसन्न सिंह का खानदानी व्यापार था लेकिन समय के साथ काफी कुछ बदल गया।
10 जून, 2015 को पिता चंद्र कुमार सिंह के गुजर जाने के बाद आशीष वृंदावन चले आएं। उन्होंने कहा कि भगवान शिव अपने भक्तों को वहीं भेज देते हैं, जिसकी वह कामना करता है। मुझे यहां उन्होंने ही भेजा। यहां हर जाति और वर्ण के लोग खुशी-खुशी रहते हैं। प्रेम की नगरी में प्यार देखने को मिलता है। वृंदावन में मेरी मुलाकात मीराबाई मंदिर के महंत और मीराबाई के वंशज प्रद्युम्न प्रताप सिंह से मुलाकात हुई। मेरी सेवा को देखकर मुझे नया नाम मिला- नृत्य मंजरी दास। 2016 से मैं यहीं पर रहकर बच्चों, युवाओं में कथक के बीजारोपण कर रहा हूं।
बनारस से 12वीं की शिक्षा लेने के बाद बीएचयू से कथक में मास्टर्स कर लिया, ताकि कोई मेरी शिक्षा पर भी सवाल न उठाए। उन्होंने कहा कि काशी कला की राजधानी रही है, शायद अब वह दौर देखने को नहीं मिलता। यहां के कई कलाकार बाहर जाकर अपनी कला को बिखेर चुके हैं लेकिन अपनी नगरी में उन्हें सम्मान नहीं मिलना काफी निराशाजनक है।