गंगा की गोद में बदली पहचान: काशी में वैदिक विधि से सनातन में लौटे असद, बने अथर्व त्यागी; कही ये बड़ी बात
Varanasi News: मध्य प्रदेश से काशी पहुंचे एक युवक ने सनातन धर्म अपनाया। गंगा की लहरों के बीच नाव पर ब्राह्मणों की उपस्थिति में विधि- विधान से उसने सनातन धर्म को अपनाया।
विस्तार
धर्म और आस्था की नगरी काशी एक बार फिर सनातन परंपरा की साक्षी बनी। मध्यप्रदेश के सागर निवासी असद खान ने वाराणसी पहुंचकर वैदिक विधि-विधान के साथ सनातन धर्म में घर वापसी की। पेशे से इंजीनियर असद खान धर्म परिवर्तन के बाद अब अथर्व त्यागी के रूप में जाने जाएंगे। अस्सी घाट से लेकर काशी विश्वनाथ धाम तक चला धार्मिक अनुष्ठान दिनभर चर्चा का विषय बना रहा।
अस्सी घाट पर शुरू हुई घर वापसी की प्रक्रिया
सोमवार को सनातन धर्म में घर वापसी की प्रक्रिया अस्सी घाट पर शुरू हुई। वैदिक आचार्यों की मौजूदगी में पहले पंचगव्य स्नान कराया गया, जिसके बाद गंगा स्नान कर आत्मशुद्धि कराई गई। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पवित्रीकरण की विधि पूरी की गई। गंगा स्नान के बाद असद खान का मुंडन संस्कार कराया गया। इसके उपरांत विधिवत हवन-पूजन संपन्न हुआ। इसके बाद वे काशी विश्वनाथ धाम पहुंचे, जहां बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।
आरती के बाद भंडारे का किया गया आयोजन
शाम को अथर्व त्यागी दशाश्वमेध गंगा आरती में शामिल हुए। आरती के बाद भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। यहीं वैदिक विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ उनकी सनातन धर्म में घर वापसी की प्रक्रिया पूर्ण हुई। इसी अवसर पर उन्होंने अपना नया नाम अथर्व त्यागी स्वीकार किया।
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21 बटुक ब्राह्मणों ने गौरी-गणेश का कराया पूजन
हिंदू युवा शक्ति के प्रदेश प्रचारक आलोक नाथ, सुधीर सिंह, सौरभ गौतम, निखिल यादव, सौम्या सिंह, ऋचा सिंह, सचिन त्रिपाठी सहित 21 बटुक ब्राह्मणों ने गौरी-गणेश का पूजन कराया। पंचगव्य स्नान के बाद गंगा पूजन कराया गया।
धर्म परिवर्तन के बाद अथर्व त्यागी ने बताया कि वे लंबे समय से इस्लाम धर्म में मौजूद कुछ धार्मिक बंधनों और आचरण से मानसिक रूप से असहज महसूस कर रहे थे। मूर्ति पूजा का विरोध, खान-पान को लेकर सख्ती और धार्मिक अनुशासन उन्हें भीतर से परेशान करता था। भगवान महाकाल में उनकी आस्था बचपन से रही है, लेकिन परिवार और समाज के दबाव के कारण वे कभी खुलकर अपनी भावना व्यक्त नहीं कर पाए।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म अपनाने के बाद उन्हें आत्मिक शांति और संतुलन की अनुभूति हो रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन का यह निर्णय उन्होंने पूरी तरह अपनी इच्छा और आस्था के आधार पर लिया है। किसी संगठन, व्यक्ति या दबाव की इसमें कोई भूमिका नहीं रही। सागर से वाराणसी तक की यह यात्रा उनके लिए आत्मविश्वास और आत्मिक स्वतंत्रता का प्रतीक है। स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया। सागर से काशी तक आस्था के इस सफर को लेकर संत समाज और श्रद्धालुओं के बीच चर्चाएं बनी हुई हैं।
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