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1965 की जंग में पाकिस्तान के छक्के छुड़ाने वाले वीर अब्दुल हमीद को आर्मी चीफ ने दी सलामी
टीम डिजिटल,वाराणसी/गाजीपुर
Updated Sun, 10 Sep 2017 03:34 PM IST
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गाजीपुर पहुंचे थल सेनाध्यक्ष, शहीद को दी सलामी
- फोटो : अमर उजाला
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अपनी तोपों से दुश्मनों के दांत खट्टे कर 1965 के भारत-पाक युद्ध परिणाम को देश के पक्ष में निर्णायक भूमिका निभाने वाले परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की 52वीं बरसी आज सारा देश मना रहा है। थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने शहीद के गांव पहुंची कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
यूपी के गाजीपुर के धामूपुर गांव में आयोजित परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद के शहादत दिवस परर आयोजित कार्यक्रम में सेनध्यक्ष ने शहीद की पत्नी को सम्मानित किया। उन्होंने वीर अब्दुल हमीद को देश का गौरव बताया।
उन्होंने कहा कि इनकी शहादत सेना और देश के युवाओं के लिए एक उदाहरण है। उनकी वीर गाथा युवाओं और सेना में जोश भरता है। बता दें कि गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में परमवीर चक्र विजेता हवलदार अब्दुल हमीद का जन्म एक गरीब परिवार उस्मान खां दर्जी के घर एक जुलाई 1933 को हुआ था। अब्दुल हमीद को बचपन से ही सेना में भर्ती होने का शौक था।
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गरीबी के कारण उन्होंने अपने पिता के काम में भी हाथ बंटाना शुरू कर दिया और दर्जी का काम भी सीख लिए। उन्हें खेल-कूद का भी शौक था। अब्दुल हमीद 22 दिसंबर 1954 को बनारस जाकर फौज में भर्ती हो गए।
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यूपी के गाजीपुर के धामूपुर गांव में आयोजित परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद के शहादत दिवस परर आयोजित कार्यक्रम में सेनध्यक्ष ने शहीद की पत्नी को सम्मानित किया। उन्होंने वीर अब्दुल हमीद को देश का गौरव बताया।
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उन्होंने कहा कि इनकी शहादत सेना और देश के युवाओं के लिए एक उदाहरण है। उनकी वीर गाथा युवाओं और सेना में जोश भरता है। बता दें कि गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में परमवीर चक्र विजेता हवलदार अब्दुल हमीद का जन्म एक गरीब परिवार उस्मान खां दर्जी के घर एक जुलाई 1933 को हुआ था। अब्दुल हमीद को बचपन से ही सेना में भर्ती होने का शौक था।
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गरीबी के कारण उन्होंने अपने पिता के काम में भी हाथ बंटाना शुरू कर दिया और दर्जी का काम भी सीख लिए। उन्हें खेल-कूद का भी शौक था। अब्दुल हमीद 22 दिसंबर 1954 को बनारस जाकर फौज में भर्ती हो गए।
वीर की वो गाथा जो भरता जोश
शहीद पार्क
- फोटो : अमर उजाला
सन 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। उस युद्ध में उनको भी अपनी वीरता दिखाने का मौका मिला। युद्ध के दौरान उनके तमाम साथी एक-एक कर धराशाई होते गए। यह सब अपनी आंखों के सामने देखकर भी उनका साहस कम नहीं हुआ।
वह कंकरीली-पथरीली जमीन पर जंगल-झाड़ियों के बीच भूखे-प्यासे, बच-बचाकर चलते रहे और एक दिन तेजपुर नामक बस्ती में पहुंच गए। इस मोर्चे की बहादुरी ने उन्हें जवान अब्दुल हमीद की जगह लांस नायक अब्दुल हमीद बना दिया।
12 मार्च 1962 के बाद उन्हें तीन वर्षों के अंदर ही नायक, हवलदार, कंपनी क्वार्टर मास्टर की उपाधि हासिल हो गई। सन् 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया तो उस युद्ध में अब्दुल हमीद ने साहस का परिचय देते हुए चीनी निर्मित तीन पैटन टैंकों को नष्ट करते हुए अपने प्राणों को देश के लिए न्यौछावर करते भारत माता की गोद में सो गए।
उनकी इस वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र सम्मान से नवाजा।