अमर उजाला अभियान शिक्षा: अपनों को खोने वालों को समर्पित 'नन्ही उड़ान', बच्चों ने निकाला उत्तर कोरोना विशेषांक
वाराणसी के चिरईगांव ब्लाक के प्राथमिक स्कूल पतेरवां के बच्चों ने अपनी रचनाधर्मिकता के जरिये यह बता दिया कि जो रचता है वही बचता है। स्कूल के बच्चों ने नन्ही उड़ान नामक अपनी पत्रिका का उत्तर कोरोना विशेषांक निकाल दिया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कोरोना संक्रमण काल ने हर किसी को दिखा दिया कि जीवन की जिजीविषा कितनी बड़ी होती है। शिक्षा क्षेत्र में जहां तरह-तरह के प्रयोग हुए वहीं बच्चों ने भी अपनी कलात्मकता के जरिये कोरोना से फैली नकारात्मकता को दूर करने की मासूम कोशिश की।
वाराणसी के चिरईगांव ब्लाक के प्राथमिक स्कूल पतेरवां के बच्चों ने अपनी रचनाधर्मिकता के जरिये यह बता दिया कि जो रचता है वही बचता है। स्कूल के बच्चों ने नन्ही उड़ान नामक अपनी पत्रिका का उत्तर कोरोना विशेषांक निकाल दिया। खास बात यह है कि कोरोना में अपनों को खोने वाले बच्चों ने इस पत्रिका को तैयार किया है।
बच्चों द्वारा पिछले पांच साल से निकाली जा रही नन्ही उड़ान का सफर अनवरत कोरोना संक्रमण काल में भी जारी रहा। शिक्षिका वंदना पांडेय ने बताया कि नन्हीं उड़ान का हर अंक अपने आप में विशेषांक होता है। बच्चों ने प्रवेशांक के बाद सामाजिक समस्या, बाल अनुभव, मीना मंच, चित्रकथा, महात्मा गांधी, मौलिक कविता, मेरा बचपन और श्रम शक्ति विशेषांक के रूप में अलग-अलग अंक निकाले हैं।
छात्रा शिवानी पहले अंक से पत्रिका में अपना योगदान दे रहीं हैं। शिवानी ने संक्रमण काल में 2020 का अंक अपने घर पर अकेले तैयार किया था। अब वह स्कूल से निकल चुकी है।
नन्ही उड़ान बनी दीवार बाल पत्रिका
बच्चों द्वारा प्रकाशित होने वाली नन्ही उड़ान की सूत्रधार प्रधानाध्यापिका शुभावती देवी व सहायक अध्यापिका वंदना पांडेय हैं। प्राथमिक विद्यालय के कक्षा पांच तक के बच्चे पिछले पांच साल से नन्ही उड़ान पत्रिका निकाल रहे हैं। संसाधनों के अभाव में पत्रिका का प्रकाशन संभव नहीं हुआ तो इसको दीवार बाल पत्रिका नाम दे दिया गया। प्रधानाध्यापिका ने बताया कि उत्तर कोरोना पत्रिका का 14वां अंक है। इसमें उन बच्चों ने योगदान दिया है, जिन्होंने अपने अभिभावकों को खोया है।
बच्चे ही तैयार करते हैं ले आउट
दीवार बाल पत्रिका को बच्चों द्वारा लिखी गई कहानी, कविताओं और चित्रों से ही तैयार किया जाता है। पत्रिका में संपादकीय लिखने का काम भी बच्चे ही कर रहे हैं। इसके साथ ही बोर्ड पर कहानी, कविताओं और चित्रों को सजाने व चयन का काम भी बच्चों को दिया जाता है। सहायक अध्यापिका वंदना पांडेय ने बताया कि कोरोना काल में पत्रिका अनियमित तो हुई थी, लेकिन बच्चाें की मेहनत से दोबारा पटरी पर आ चुकी है।