श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026: पांच साल बाद उदया तिथि और रोहिणी नक्षत्र की अष्टमी एक ही दिन, जानें- खास
काशी में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर तैयारियों जोरों पर हैं। यहां मंदिरों, मठों, आश्रमों और घरों में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। इस बार प्रभु के जन्मोत्सव पर व्रत रखकर पूजा करने से पुण्य, सिद्धियों की प्राप्ति और मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।
विस्तार
गृहस्थ (स्मार्त) उदया तिथि (सूर्योदय के समय जो तिथि हो) और अष्टमी के मानक नियमों के अनुसार व्रत रखते हैं। वैष्णव संप्रदाय (संत और इस्कॉन अनुयायी) निशीथ काल (मध्यरात्रि) में अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र के मिलन और पारण के नियमों का पालन करते हैं। लेकिन, खगोलीय संयोग कुछ वर्षों, दशकों बाद बनता है, जब रोहिणी नक्षत्र और उदया तिथि की अष्टमी एक ही दिन पड़ेगी। इसके चलते गृहस्थ और वैष्णव एक ही दिन जन्माष्टमी मनाते हैं।
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष व प्रख्यात ज्योतिषविद प्रो. नागेंद्र पांडेय ने बताया कि गृहस्थजनों के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि होना जरूरी है। जबकि वैष्णवजनों के लिए रोहिणी नक्षत्र जरूरी होता है। इस बार उदया तिथि की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र की अष्टमी एक ही दिन पड़ रही है। इसलिए दोनों के लिए यह पर्व एक ही दिन होगा।
रोहिणी नक्षत्र तीन सितंबर को रात तक में 12:43 बजे से अगले दिन उदया तिथि में चार सितंबर को रात में 11:12 बजे तक है। इस दुर्लभ संयोग में सनातन धर्मियों के लिए व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव उल्लास से मनाते हैं तो उनकी मनोकामना पूर्ण होती है।
बीएचयू ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय पांडेय के अनुसार, भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तीन सितंबर की रात 1:33 बजे ही लग जाएगी और चार सितंबर की रात 11:13 बजे तक रहेगी। रोहिणी नक्षत्र, अष्टमी तिथि और औदायिक रोहिणी तीनों के मिलने से वैष्णव और गृहस्थ चार सितंबर को ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाएंगे।