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Varanasi News: आचार्य शुक्ल ने हिंदी इतिहास लेखन को दिया वैज्ञानिक, तार्किक और तथ्यात्मक आधार
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वाराणसी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रासंगिकता इस बात में है कि उन्होंने हिंदी आलोचना और इतिहास लेखन को एक वैज्ञानिक, तार्किक और तथ्यात्मक आधार दिया है। रविंद्रपुरी स्थित आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान की ओर से उनकी 142वीं जयंती पर रविवार को मनाई गई। संस्थान की अध्यक्ष डॉ. मुक्ता ने कहा कि शुक्ल जी की कृति हिंदी साहित्य का इतिहास जीवन का भी इतिहास है। अध्यक्षता करते हुए जेएनयू के प्रोफेसर रहे प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने इसी कृति को सबसे प्रामाणिक और व्यवस्थित इतिहास बताया। साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह ने कहा कि भाषा को सजीव बनाने के लिए शुक्ल जी ने ग्रामीण बोलचाल, कहावतों और मुहावरों का प्रयोग किया है। इस मौके पर डॉ. मुक्ता की कहानियों का बांग्ला में अनुवाद निर्वाचित गल्प का लोकार्पण हुआ।
मुख्य अतिथि डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि उनके साहित्य का उद्देश्य समाज के लोक-मंगल की भावना को आगे बढ़ाना है। प्रो. अवधेश प्रधान ने रस सिद्धांत की मनोवैज्ञानिक की और आलोचना को पक्षपात से मुक्त किया। डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी ने कहा कि आचार्य शुक्ल ने अपने समय तक उपलब्ध सामग्री के आधार पर काम किया। प्रो. सुरेंद्र प्रताप ने कहा कि शुक्ल जी की दृष्टि समन्वयवादी थी, जो आज के वैचारिक संघर्षों में भी प्रासंगिक हैं। डॉ. इंदीवर पांडेय ने कहा कि उन्होंने कवि और रचना को उसके युगीन परिवेश और ऐतिहासिक परंपरा के संदर्भ में देखा है।
निबंधों में बौद्धिक चिंतन और भावनात्मकता का संतुलन
प्रो. श्रद्धानंद का मत था कि शुक्ल जी के निबंधों में बौद्धिक चिंतन और भावनात्मकता दोनों का सुंदर संतुलन मिलता है। डॉ. शशिकला पांडेय ने कहा कि उनकी भाषा शैली गंभीर, स्पष्ट और मौलिक है। डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने कहा कि उस पूरे युग को शुक्ल युग का नाम दिया जाता है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अत्रि भारद्वाज ने कहा कि उनकी शैली में गागर में सागर भरने जैसी क्षमता थी। संचालन डॉ. संगीता श्रीवास्तव और धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के मंत्री प्रो. मंजीत चतुर्वेदी ने किया।
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रामचंद्र शुक्ल की आलोचना में बनारसी स्वभाव भी है वजह
वाराणसी। बीएचयू के पुलिया प्रसंग में हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल पश्चिम से टकराते हुए हिंदी आलोचना को स्वाधीनता देते हैं। उनके आलोचकीय व्यक्तित्व के निर्माण में उनके बनारसी स्वभाव और अनुवादक व्यक्तित्व भी था। आलोचक प्रो. कमलेश वर्मा ने शुक्ल जी की आलोचना को साधनावस्था की आलोचनाडॉ. शैलेंद्र कुमार सिंह ने शुक्ल जी को हिंदी आलोचना का जंक्शन कहा जहां से हर तरफ का मार्ग निकलता है। युवा आलोचक डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, डॉ. विंध्याचल यादव और रांची से आए समीक्षक डॉ. उपेंद्र सत्यार्थी ने भी विचार रखे।
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मुख्य अतिथि डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि उनके साहित्य का उद्देश्य समाज के लोक-मंगल की भावना को आगे बढ़ाना है। प्रो. अवधेश प्रधान ने रस सिद्धांत की मनोवैज्ञानिक की और आलोचना को पक्षपात से मुक्त किया। डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी ने कहा कि आचार्य शुक्ल ने अपने समय तक उपलब्ध सामग्री के आधार पर काम किया। प्रो. सुरेंद्र प्रताप ने कहा कि शुक्ल जी की दृष्टि समन्वयवादी थी, जो आज के वैचारिक संघर्षों में भी प्रासंगिक हैं। डॉ. इंदीवर पांडेय ने कहा कि उन्होंने कवि और रचना को उसके युगीन परिवेश और ऐतिहासिक परंपरा के संदर्भ में देखा है।
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निबंधों में बौद्धिक चिंतन और भावनात्मकता का संतुलन
प्रो. श्रद्धानंद का मत था कि शुक्ल जी के निबंधों में बौद्धिक चिंतन और भावनात्मकता दोनों का सुंदर संतुलन मिलता है। डॉ. शशिकला पांडेय ने कहा कि उनकी भाषा शैली गंभीर, स्पष्ट और मौलिक है। डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने कहा कि उस पूरे युग को शुक्ल युग का नाम दिया जाता है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अत्रि भारद्वाज ने कहा कि उनकी शैली में गागर में सागर भरने जैसी क्षमता थी। संचालन डॉ. संगीता श्रीवास्तव और धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के मंत्री प्रो. मंजीत चतुर्वेदी ने किया।
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रामचंद्र शुक्ल की आलोचना में बनारसी स्वभाव भी है वजह
वाराणसी। बीएचयू के पुलिया प्रसंग में हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल पश्चिम से टकराते हुए हिंदी आलोचना को स्वाधीनता देते हैं। उनके आलोचकीय व्यक्तित्व के निर्माण में उनके बनारसी स्वभाव और अनुवादक व्यक्तित्व भी था। आलोचक प्रो. कमलेश वर्मा ने शुक्ल जी की आलोचना को साधनावस्था की आलोचनाडॉ. शैलेंद्र कुमार सिंह ने शुक्ल जी को हिंदी आलोचना का जंक्शन कहा जहां से हर तरफ का मार्ग निकलता है। युवा आलोचक डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, डॉ. विंध्याचल यादव और रांची से आए समीक्षक डॉ. उपेंद्र सत्यार्थी ने भी विचार रखे।