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Varanasi: अयोध्या के संत आचार्य मिथिलेश बोले, रामनगर की रामलीला के संस्थापक को ही भूल गए काशी नरेश के वंशज
Sun, 06 Oct 2024 03:12 PM IST
प्रगति चंद
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: प्रगति चंद
Updated Sun, 06 Oct 2024 03:12 PM IST
सार
Ramlila 2024 : बीएचयू में अयोध्या से आए आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण जी ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि काशी राज हाथी पर बैठकर राजा को देखने के लिए आते हैं तो होना ये चाहिए कि रामलीला के संस्थापकों का चित्र हाथ में लेकर आना चाहिए।
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रामनगर रामलीला के पात्रों को सम्मानित करते आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण जी महाराज।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पूरी दुनिया में एकमात्र रामनगर की रामलीला है, जहां राजा को भी आकर झुकना पड़ता है। इतिहास में जितने भी राजा हुए, सबने दूसरों को अपना राज दरबारी बनाया। लेकिन, रामनगर की रामलीला को स्थापित करने वाले संत को आज उसी काशी नरेश के वंशज भूल चुके हैं। आज पूरे रामनगर में न तो उनकी कहीं मूर्ति है और न ही उन्हें कोई याद करने वाला।
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ये बातें बीएचयू में अयोध्या से आए आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहीं। भारत अध्ययन केंद्र में अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा कि रामनगर रामलीला वांग्मय लिखने वाले देवतीर्थ काष्ठ जिह्वा स्वामी पूर्व काशी नरेश महीप नारायण के गुरु थे। यदि काशी नरेश के वंशज आज काष्ठ जिह्वा स्वामी की चित्रकला लेकर ही रामनगर की रामलीला देखने के लिए जाते या कहीं कुछ संस्मरण बनवा देते तो ये एक राजा की अपने गुरुओं के प्रति सच्ची भक्ति होगी। आचार्य मिथिलेशनंदिनी ने कहा कि काशी नरेश, हालांकि अब ये पद नहीं है, उनके प्रतिनिधि को फिर से अपने गुरुओं की ओर लौटना होगा।
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मिथिलेशनंदिनी ने संत श्रीदेवतीर्थ काष्ठजिह्वा स्वामी और काशी विषय पर कहा कि काशी के विद्वानों ने जिसे नकार दिया, वो भी इस जहां का बहुत बड़ा व्यक्तित्व बन गया। इसमें कबीर दास जैसे लोग हैं। तुलसी दास के लिखे रामचरित मानस पर काशी के विद्वानों ने सवाल उठाया तो देवतीर्थ स्वामी ने ही टीका लिखकर तुलसीदास को सबसे बेहतर बताया था।
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40 साल हनुमान बनने वाले पात्र का सम्मान
आचार्य मिथिलेशनंदिनी ने रामनगर की रामलीला के पात्रों को सम्मानित किया। इस दौरान रामलीला में बीते 40 साल तक लगातार हनुमान बनने वाले पंडित राम नारायण पांडेय से उनका अनुभव जाना। राम नारायण ने कहा कि रामलीला स्थलों में देवत्व है। करपात्री जैसे संत इन स्थानों की परिक्रमा करते थे। इसके रज को माथे पर लगाते थे। कार्यक्रम में भारत अध्ययन केंद्र के समन्यवक प्रो. सदाशिव द्विवेदी और प्रो. सिद्धनाथ पांडेय आदि मौजूद थे।