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एनीमिया पीडि़त महिलाओं के लिए वरदान है मंडूर भस्म

Thu, 04 Jul 2013 05:30 AM IST
Varanasi
Varanasi Updated Thu, 04 Jul 2013 05:30 AM IST
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वाराणसी। मंडूर भस्म (लोहे का चूर्ण) एनीमिया पीडि़त महिलाआें के लिए वरदान सरीखा है। यह दावा है बीएचयू के आयुर्वेद संकाय के चिकित्सकाें का। चिकित्सकों की एक टीम ने शोध में पाया कि मंडूर भस्म की एक निश्चित मात्रा एक माह तक इस्तेमाल करने से रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ जाती है। शोध के बाद बीएचयू के फार्मेसी में मंडूर भस्म का निर्माण शुरू हो गया है। इसे बीएचयू अस्पताल में सप्लाई किया जाएगा।
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आयुर्वेद संकाय के रस शास्त्र विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डा. अलका अग्रवाल के निर्देशन में शोध छात्र निरंजन सोनकर और दो रेजिडेंट चिकित्सकों ने मंडूर भस्म पर एक साल पूर्व शोध शुरू किया था। चिकित्सा विज्ञान संस्थान के लैब में खून में हीमोग्लोबिन की कमी से पीडि़त चूहाें पर मंडूर भस्म का प्रयोग किया गया। एक माह बाद पीडि़त चूहाें में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ गई। इसके बाद आयुर्वेद अस्पताल की ओपीडी में आने वाली एनीमिया पीडि़त 40 महिलाआें को मंडूर भस्म दिया गया। इन महिलाआें में प्रति सौ एमएल रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा आठ से नौ ग्राम थी। इन महिलाआें ने एक माह तक प्रतिदिन 125 मिलीग्राम मंडूर भस्म लिया। इसके बाद इन महिलाआें के सौ एमएल खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़कर 13 ग्राम तक हो गई। परीक्षण में यह भी पाया गया कि मंडूर भस्म और रससिंदूर (पारद और गंधक का चूर्ण) बराबर मात्रा में एकसाथ सेवन करने पर रक्त बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। हालांकि, चिकित्सकों के मुताबिक गर्भवती महिलाआें को मंडूर के साथ रससिंदूर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। क्योंकि, गर्भ में पल रहे बच्चे पर इसका विपरीत असर पड़ता है। डा. अलका अग्रवाल ने बताया कि अब मधुमेह पीडि़तों पर मंडूर भस्म के प्रभाव पर शोध चल रहा है। उन्हाेंने बताया कि 30 ग्राम भस्म की कीमत लगभग सौ रुपये पड़ेगी।
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कैसे बनता है मंडूर भस्म
मंडूर भस्म बनाने के लिए अशुद्ध मंडूर को लोहे के पात्र में रखकर 750 सेंटीग्रेट तापमान पर शुद्ध किया जाता है। इसके बाद मंडूर को त्रिफला क्वाथ में आठ घंटे तक पीसते हैं। फिर उसे धूप में सुखाया जाता है। उसके बाद मंडूर भस्म तैयार हो जाता है। इसका रंग लाल होता है।
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