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नइहरे में मांगीला भाई रे भतीजवा ससुरे भरल परिवार...
Updated Fri, 27 Oct 2017 01:42 AM IST
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वाराणसी। ‘बाजे तोहें झंझकार ए छठ मइया बाजे तोहें झंझकार/नइहरे में मांगीला पांच रे बिरनवा बहिनी जे मांगिली अकेल/नइहरे में मांगिला भाई रे भतिजवा ससुरे भरल परिवार ये छठ मइया.... अपने के मांगीला अवध सिंधोरवा जुग जुग बाढ़े अहिवात/घोड़ा चढ़ल पुत्र एक मांगीला सुंदर सांवर पतोह ये छठ मइया...।’ सूर्योपासना के डाला षष्ठी व्रत पर गुरुवार की शाम अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने गंगा तटों, सरोवरों, कुंडों पर महिलाओं की भीड़ नैहर से ससुराल तक की समृद्धि और मंगलकामना के ऐसे ही गीत गाते हुए पहुंची। शहनाई की मंगलध्वनि, बैंड-बाजा और आतिशबाजी के बीच लोकोत्सव की छटा निहारते बनी। सांझ ढलने के साथ ही अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर व्रतियों ने घर, परिवार से लेकर सकल समाज के मंगल के लिए कामना की। उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही शुक्रवार की सुबह व्रत का पारण होगा।
दोपहर बाद से ही गंगा तट पर बनी वेदियों पर डाला सजाने के लिए व्रतियों के समूह बाजे-गाजे के साथ घरों से निकलने लगे। शाम चार बजे तक अस्सी से राज घाट के अलावा संत रविदास घाट से विश्व सुंदरी पुल तक व्रतियों और उनके परिवारीजनों, रिश्तेदारों की भीड़ के चलते कहीं खड़े होने तक की जगह नहीं बची।
मनौती मानने वाली तमाम व्रती महिलाएं सड़कों पर लेटते हुए वेदियों तक पहुंचीं। दशाश्वमेध घाट पर भीड़ इस कदर उमड़ी कि जो जहां था, वहां से हिल नहीं सका। वेदियों पर हल्दी-चंदन की अल्पनाएं उकेरी गईं। गन्ने के मंडप के बीच सूप-दउरी में व्यंजनों, फूलों, फलों से डाला सजाए गए। दीपदान के साथ वेदियों पर व्रतियों ने माथे से लेकर नाक तक सिंदूर के लंबे टीके लगाए।
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राणा महल घाट, अहिल्याबाई घाट, पांडेय घाट, केदार घाट के अलावा मणिकर्णिका घाट, सिंधिया घाट, रामघाट, पंचगंगा घाट, राजघाट पर आतिशबाजी और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया गया। पतियों और पुत्रों ने अर्घ्य दिलाया। डाला की पूजा के बाद गंगा, वरुणा, गोमती के तटों के अलावा सूर्य सरोवर, ईश्वरगंगी तालाब आदि गंगा के किनारे हजारों व्रतियों ने रात्रिपर्यंत जागरण आरंभ किया तो कुछ के परिजन डाला सिर पर रखकर घरों के लिए विदा हो गए। भोर में फिर डाला की पूजा के साथ उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए सैलाब उमड़ेगा।
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दोपहर बाद से ही गंगा तट पर बनी वेदियों पर डाला सजाने के लिए व्रतियों के समूह बाजे-गाजे के साथ घरों से निकलने लगे। शाम चार बजे तक अस्सी से राज घाट के अलावा संत रविदास घाट से विश्व सुंदरी पुल तक व्रतियों और उनके परिवारीजनों, रिश्तेदारों की भीड़ के चलते कहीं खड़े होने तक की जगह नहीं बची।
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मनौती मानने वाली तमाम व्रती महिलाएं सड़कों पर लेटते हुए वेदियों तक पहुंचीं। दशाश्वमेध घाट पर भीड़ इस कदर उमड़ी कि जो जहां था, वहां से हिल नहीं सका। वेदियों पर हल्दी-चंदन की अल्पनाएं उकेरी गईं। गन्ने के मंडप के बीच सूप-दउरी में व्यंजनों, फूलों, फलों से डाला सजाए गए। दीपदान के साथ वेदियों पर व्रतियों ने माथे से लेकर नाक तक सिंदूर के लंबे टीके लगाए।
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राणा महल घाट, अहिल्याबाई घाट, पांडेय घाट, केदार घाट के अलावा मणिकर्णिका घाट, सिंधिया घाट, रामघाट, पंचगंगा घाट, राजघाट पर आतिशबाजी और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया गया। पतियों और पुत्रों ने अर्घ्य दिलाया। डाला की पूजा के बाद गंगा, वरुणा, गोमती के तटों के अलावा सूर्य सरोवर, ईश्वरगंगी तालाब आदि गंगा के किनारे हजारों व्रतियों ने रात्रिपर्यंत जागरण आरंभ किया तो कुछ के परिजन डाला सिर पर रखकर घरों के लिए विदा हो गए। भोर में फिर डाला की पूजा के साथ उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए सैलाब उमड़ेगा।