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आस्थावानों ने बसाया अनूठा ‘शिवलोक’
Updated Fri, 06 Oct 2017 01:47 AM IST
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वाराणसी। मोक्षनगरी काशी में अनूठे शिवलोक का दर्शन कीजिए। इस शिवलोक की रचना आस्थावान कर रहे हैं। परंपराओं की नगरी में शिव के स्वरूप में पूर्वजों को प्रतिष्ठापित करने की अद्भुत परिपाटी जंगमबाड़ी मठ में विस्तार ले रही है। मठ में अबतक ढाई लाख से अधिक पूर्वजों को शिवलिंग के रूप में स्थापित कर उनकी पूजा की जा रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों से हर रोज शिवलिंग की प्रतिष्ठापना करने श्रद्धालु वहां पहुंच रहे हैं। मंदिर परिसर में अब जगह न होने के चलते मठ प्रबंधन इसके लिए अलग कक्षों में रैक बनवा दिया है। पुनर्जन्म की अवधारणा को न मानने वाले वीर शैव संप्रदाय के उपासक अपने पूर्वजों को शिवलिंग के रूप में प्रतिष्ठापित कर रहे हैं।
जंगमबाड़ी मठ में गुरुवार को महाराष्ट्र से आए कई वंशजों ने अपने पूर्वजों को शिवलिंग के रूप में प्रतिष्ठापित किया। मठ के भीतर प्रवेश करते ही मंदिरों में शिवलिंगों की कचहरी देखते बन रही है। वहां छोटे-बड़े शिवलिंगों की दीर्घाएं सज गई हैं। मंदिरों में जगह न बचने पर मठ प्रबंधन ने परिसर के दक्षिणी हिस्से में तीन अलग-अलग कक्ष बनवा दिए हैं। उन कक्षों में भी शिवलिंगों की चतुर्दिक स्थापना होने पर अब रैक में स्मृतियां संजोई जा रही हैं। जंगमबाड़ी मठ के पीठाधीश्वर विश्वाराध्य जगदगुरु डॉ. चंद्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी बताते हैं कि वीर शैव संप्रदाय में गर्भधारण के आठवें महीने में ही ईष्टलिंग गर्भस्थ शिशु के नाम पर मां को धारण करा दिया जाता है। जन्म के आठवें महीने तक मां उस शिवलिंग की पूजा करती है और फिर उस शिशु के नाम पर उसे स्थापित कर दिया जाता है। इस संप्रदाय में पुनर्जन्म की अवधारणा नहीं है। ऐसे में देहावसान के बाद शिव के रूप में उस आत्मा को प्रतिष्ठापित कर दिया जाता है। एकेन जन्मना मुक्ति:। यानी वीर शैव संप्रदाय के उपासकों का मानना है कि देह त्याग के बाद दूसरा जन्म नहीं होता। इसलिए शिव स्वरूप में उनको मुक्ति प्रदान की जाती है।
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जंगमबाड़ी मठ में गुरुवार को महाराष्ट्र से आए कई वंशजों ने अपने पूर्वजों को शिवलिंग के रूप में प्रतिष्ठापित किया। मठ के भीतर प्रवेश करते ही मंदिरों में शिवलिंगों की कचहरी देखते बन रही है। वहां छोटे-बड़े शिवलिंगों की दीर्घाएं सज गई हैं। मंदिरों में जगह न बचने पर मठ प्रबंधन ने परिसर के दक्षिणी हिस्से में तीन अलग-अलग कक्ष बनवा दिए हैं। उन कक्षों में भी शिवलिंगों की चतुर्दिक स्थापना होने पर अब रैक में स्मृतियां संजोई जा रही हैं। जंगमबाड़ी मठ के पीठाधीश्वर विश्वाराध्य जगदगुरु डॉ. चंद्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी बताते हैं कि वीर शैव संप्रदाय में गर्भधारण के आठवें महीने में ही ईष्टलिंग गर्भस्थ शिशु के नाम पर मां को धारण करा दिया जाता है। जन्म के आठवें महीने तक मां उस शिवलिंग की पूजा करती है और फिर उस शिशु के नाम पर उसे स्थापित कर दिया जाता है। इस संप्रदाय में पुनर्जन्म की अवधारणा नहीं है। ऐसे में देहावसान के बाद शिव के रूप में उस आत्मा को प्रतिष्ठापित कर दिया जाता है। एकेन जन्मना मुक्ति:। यानी वीर शैव संप्रदाय के उपासकों का मानना है कि देह त्याग के बाद दूसरा जन्म नहीं होता। इसलिए शिव स्वरूप में उनको मुक्ति प्रदान की जाती है।
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