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तीन दशक में मिटने के कगार पर पहुंच गई वरुणा

Fri, 15 Dec 2017 02:17 AM IST
Updated Fri, 15 Dec 2017 02:17 AM IST
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तीन दशक में मिटने के कगार पर पहुंच गई वरुणा
वाराणसी। सदियों से वाराणसी की पहचान रही वरुणा नदी के स्वरूप पर गुजरे तीन दशक भारी पड़ गए। 27 साला में हालात ऐसे हो गए कि जो वरुणा कभी गर्मी में भी कल-कल बहा करती थी, वह अब जाड़े की शुरुआत के साथ ही सूख गई है। शहरी क्षेत्र में इसमें पानी के नाम पर सीवेज और गाद के अलावा कुछ नहीं बचा है।
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विस्तार लेते शहर और तेजी से बढ़ती आबादी के बीच बेतहाशा अवैध निर्माणों से वरुणा नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जिम्मेदार विभागों के अफसरों और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से नदी का वजूद सिकुड़ता चला गया। उसके प्राकृतिक स्वरूप की अनदेखी कर कई जगह तलहटी तक अवैध निर्माण करा दिए गए। आदिकेशव सराय मोहाना स्थित गंगा-वरुणा संगम स्थल पर तो सीवेज की दुर्गंध से खड़े होना मुश्किल है। यही हाल वहां से लेकर शिवपुर तक है। सराय मोहाना के संगम स्थल से लेकर शिवपुर तक वरुणा सिकुड़ी हुई है। दोनों किनारों पर नदी का कछार कब्जा कर कुछ लोग सरसों, गेहूं और सब्जियों की खेती कर रहे हैं। नक्खी घाट, चौकाघाट के पास तो नदी की तलहटी तक में कब्जा हो गया है। नदी का स्वरूप नाले जैसा हो गया है।
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झोपड़ियां ही नहीं, घौसाबाद से चौकाघाट के बीच कई जगह बहुमंजिली इमारतें और रिहायशी भवन बन गए हैं। सराय मोहाना के बाद कोनिया, किलाकोहना, पुरानापुल और नक्खीघाट के समीप नदी के दोनों किनारों पर डूब क्षेत्र के कुछ बचे हिस्से में अधिकारियों की अनदेखी से निर्माण हो रहे हैं।
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खासकर कैंटोनमेंट से शिवपुर के बीच नदी के डूब क्षेत्र पर अवैध निर्माण और भू-माफिया के कब्जे ने हालत बदतर कर दी है। क्षेत्र के बुजुर्गों के मुताबिक 1990 से पहले वरुणा में बारह महीने प्रवाह बना रहता था। तब नहाने-धोने के साथ ही पेयजल के रूप में भी इसके पानी का इस्तेमाल होता था।
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