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दहेज उत्पीड़न के बंदियों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा पत्र, जानिए क्या लिखा?
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Wed, 03 May 2017 11:58 PM IST
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जेल की सांकेतिक तस्वीर..
- फोटो : self
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दहेज उत्पीड़न के मामले में जिला जेल में बंद बंदियों ने जेल से मुक्त कराए जाने की मांग उठाई है। बुधवार को 54 बंदियों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को रजिस्ट्री भेजी है।
इसमें मौलिक अधिकारों का ख्याल रखने का हवाला देते हुए उन्हें मुफ्त में कानूनी सलाह उपलब्ध कराने की बात उठाई है।
भेजे गए पत्र में 48 बंदियों के हस्ताक्षर हैं जबकि छह ने अंगूठा निशान लगाया है।
पत्र में कहा गया है कि वे लंबे समय से दहेज उत्पीड़न के आरोप में जेल में हैं। उनका कोई पैरवीकार नहीं है। गरीबी, बदहाली व पैरवी तथा धन के अभाव में जेल में निरुद्ध चले आ रहे हैं। डीपी एक्ट के निराधार आरोप में जेल में बंद होने से उनके परिवार की स्थिति खराब है।
लिखा है कि जेल में निरुद्ध होने से पूरा परिवार बर्बाद होकर अंतिम पायदान पर खड़ा है। गरीब, असहाय व कमजोर वर्ग का होने के नाते कोई सुनवाई नहीं होती है।
कोई पैरवीकार न होने के नाते एक लंबा समय जेल में बीत जाने के बाद भी मुकदमे में जमानत नहीं मिल पाती और न ही मामले का निस्तारण हो पाता है। बंदियों ने मानवता और मौलिक अधिकारों का ख्याल रखने का हवाला देते हुए मुकदमे के निस्तारण के लिए मुफ्त कानूनी सलाह और पैरवीकार दिलाने की मांग की है।
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बंदियों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के अलावा गृह मंत्री, कानून मंत्री, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, मुख्य न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय, मुख्यमंत्री यूपी, प्रमुख सचिव गृह, उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग, मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय इलाहाबाद, पुलिस महानिदेशक और जिला जज को रजिस्टर्ड पत्र भेजा है।
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इसमें मौलिक अधिकारों का ख्याल रखने का हवाला देते हुए उन्हें मुफ्त में कानूनी सलाह उपलब्ध कराने की बात उठाई है।
भेजे गए पत्र में 48 बंदियों के हस्ताक्षर हैं जबकि छह ने अंगूठा निशान लगाया है।
पत्र में कहा गया है कि वे लंबे समय से दहेज उत्पीड़न के आरोप में जेल में हैं। उनका कोई पैरवीकार नहीं है। गरीबी, बदहाली व पैरवी तथा धन के अभाव में जेल में निरुद्ध चले आ रहे हैं। डीपी एक्ट के निराधार आरोप में जेल में बंद होने से उनके परिवार की स्थिति खराब है।
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लिखा है कि जेल में निरुद्ध होने से पूरा परिवार बर्बाद होकर अंतिम पायदान पर खड़ा है। गरीब, असहाय व कमजोर वर्ग का होने के नाते कोई सुनवाई नहीं होती है।
कोई पैरवीकार न होने के नाते एक लंबा समय जेल में बीत जाने के बाद भी मुकदमे में जमानत नहीं मिल पाती और न ही मामले का निस्तारण हो पाता है। बंदियों ने मानवता और मौलिक अधिकारों का ख्याल रखने का हवाला देते हुए मुकदमे के निस्तारण के लिए मुफ्त कानूनी सलाह और पैरवीकार दिलाने की मांग की है।
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बंदियों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के अलावा गृह मंत्री, कानून मंत्री, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, मुख्य न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय, मुख्यमंत्री यूपी, प्रमुख सचिव गृह, उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग, मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय इलाहाबाद, पुलिस महानिदेशक और जिला जज को रजिस्टर्ड पत्र भेजा है।