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लॉकडाउन के 5 माह: बुनकरों का छलका दर्द, बता रहे कैसे चल रही है रोजी-रोटी

Wed, 26 Aug 2020 11:29 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Wed, 26 Aug 2020 11:29 AM IST
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5 months of Lockdown: bunkar Weavers spill pain, telling how livelihood is going in varanasi
लॉकडाउन में बुनकरों के पास नहीं काम। - फोटो : अमर उजाला

वाराणसी की बुनकर कॉलोनी में सन्नाटा पसरा हुआ है। दोपहर 12 बजे घरों के बाहर चबूतरे पर बुनकर बेकार बैठे हैं। 24 घंटे गूंजने वाली पावर लूम की खटर-पटर की जगह हर घर में खामोशी पसरी है। लॉकडाउन में यहां किसी ने गुजारा करने के लिए पत्नी के गहने बेच दिए तो किसी ने मशीनों को कबाड़ी को बेच दी। कुछ ने तो बुनकरी छोड़ सब्जी का ठेला लगाना शुरू कर दिया है। 

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बनारसी साड़ी को दुनिया में पहचान दिलाने वाले बुनकर अब इस धंधे से दूर हो रहे हैं। अमर उजाला की टीम जब नाटी इमली स्थित बुनकर कॉलोनी में पहुंचकर बुनकरों की नब्ज टटोली। बुनकर व्यापारी अबुल हसन से जब हमने लॉकडाउन के बाद बुनकरों के हालत पर बात छेड़ी तो बुजुर्ग चेहरे पर बेबसी का दर्द छलक आया।
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बोले कि छह महीने हो गए न तो एक मीटर कपड़ा बिका और न ही एक रुपये की आमदनी हुई है। बुनकर मुश्ताक भी बोल पड़े कि आठ लोगों का परिवार है बस अल्लाह ही जानता है कि कैसे रोजी-रोटी का इंतजाम हो रहा है। नसीम की तानी में भी सन्नाटा है। सभी काम करने वाले बैठकर बातचीत में मशगूल थे।
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नसीम ने बताया कि कोई ऑर्डर ही नहीं आ रहा है। तो काम भी एकदम ठप हो गया है। बुनकरों का कहना है कि एक तो लॉकडाउन की मार और इसी में बिजली की सब्सिडी को भी सरकार ने खत्म करके बुनकरी पर दोहरी मार कर दी है।

सरैया, जलालीपुरा, नक्खी घाट, दोषीपुरा, जैतपुरा, छोहरा क्षेत्र में कई बुनकरों ने अपना लूम कौड़ियों के भाव बेचकर घर में ही दुकान खोल ली है या फिर ई रिक्शा चला कर अपने घर की जरूरतें पूरी कर रहे हैं। लॉकडाउन से लेकर अनलॉक तक आने के बावजूद भी काशी के बुनकरों की आर्थिक स्थिति नहीं सुधर रही है। नतीजा पांच लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बुनकरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।

नहीं है ऑर्डर, छोटे कारीगर हुए बेरोजगार 
साड़ी व्यापारी हसीन अहमद ने कहा कि आयात और निर्यात पूरी तरह से बंद हैं। बड़े व्यापारियों के पास आर्डर नहीं आने से छोटे कारीगरों को भी काम नहीं मिल रहा है। दुकान और शोरूम में पुराना माल ही पड़ा हुआ है। पहले बुनकर दस दिन में एक साड़ी तैयार करके देते थे अब वही काम नहीं होने के कारण एक महीने में तैयार कर रहे हैं। वहीं छोटे कारीगरों और जरूरतमंदों की राशन और पैसे से मदद की जा रही है।

नहीं चालू हो सका है लूम का बाना 
कमालपुरा निवासी बुनकर मोहम्मद नदीम ने बताया कि लॉक डाउन में सरकार की ओर से मिली कुछ छूट के बाद व्यापार के आसार नजर आने शुरू हुए तो बिजली पर मिलने वाली सब्सिडी खत्म कर दी गई। अब ऐसी स्थिति बन गई है कि उन्हें पुश्तैनी धंधा भी छोड़ना पड़ रहा है।

कोरोना ने ठप कर दिया है धंधा 
भारद्वाजी टोला के सचिन गुप्ता ने बताया कि हर साल जुलाई, अगस्त और नवंबर में चंदेरी, मोनिका, कोलिस्ट जैसे कपड़े लूम में बनते थे। लेकिन लॉकडाउन के कारण धंधा ठप पड़ा है। वहीं कारीगरों को भी आर्थिक मदद के साथ घर के लिए राशन भी दिया जा रहा है। 

लूम बंद करने के अलावा नहीं है कोई चारा 
ख्वाजापुरा के हसीना अहमद, सलारपुरा के सलीम, काजीपुरा के जियाउल हक, अलईपुरा के सोनू खान और बकरियाकुंड के गुलजार अंसारी ने भी कहा कि जहां पहले बुनकर कार्ड पर एक किलो वाट का बिल 150 रुपये था। वहीं यदि प्रति यूनिट के हिसाब भुगतान कराया तो एक दिन में 2200 के करीब बिजली का बिल आएगा। बुनकरों के सामने लूम बंद करने के अलावा कोई चारा नहीं है।

बेच दिए पत्नी के जेवरात 
जलालीपुरा के बुनकर मो जहीर ने बताया कि घर में कुछ करघे बंद पड़े हैं तो कुछ को उन्होंने खोलकर खूंटी पर टांग दिया है। शमशुद्दीन कहते हैं कि 22 लोगों का परिवार है। लेकिन लॉकडाउन में मशीनें बंद हुईं तो कमाई भी ठप हो गई। जमापूंजी खत्म हुई तो कर्ज लिया बाद में पत्नी के जेवरात बेचने पड़े। 5.5 किलो गेहूं व चावल सरकारी कोटे से मिला है। चटनी चावल खाकर दिन काट रहे हैं।

अब देना होगा 16 सौ रुपये प्रति पावरलूम
बुनकर साझा मंच के इदरीश अंसारी ने बताया कि 2006 में मुलायम सिंह यादव की सरकार में बुनकरों को 150 करोड़ रुपए का सबसे बड़ा पैकेज मिला था। बिजली विभाग को 72 रुपए देकर एक माह तक पावरलूम चलता था।

2019 तक यही व्यवस्था रही। लेकिन योगी सरकार ने अब इसे 1600 रुपये प्रति एक पावरलूम कर दिया है। बुनकर समाज इसका विरोध कर रहा है। दूसरी मार जीएसटी लागू होने के बाद पड़ी है। वर्तमान में काशी में 30 हजार से अधिक बुनकर कार्ड और डेढ़ लाख के करीब पावरलूम होंगे। हैंडलूम 10 प्रतिशत ही बचा होगा।

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