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किसान बोले, आलू का सही मूल्य दिलाए सरकार
Updated Sun, 07 Jan 2018 01:21 AM IST
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ज्ञानपुर। लखनऊ में विधानसभा के सामने सड़क पर आलू बिखेर कर विरोध जताने के पीछे किसानों की पीड़ा उभरी है। हजारों रुपये की लागत लगाकर फसल उपजाने के बाद किसानों को जब उनकी लागत का मूल्य भी नहीं मिलता तो पीड़ा होना स्वाभाविक है। शनिवार को इस मसले पर जिले के किसानों ने कुछ इस तरह रायशुमारी की। आलू किसानों की बदहाली पर अमर उजाला से बातचीत के दौरान कहा कि आलू किसानों की बदहाली दूर करने के लिए सरकार को आगे आना चाहिए।
खमरिया के किसान किशोर चंद्र बरनवाल ने कहा कि तमाम झंझावातों के बाद जतन कर अगर आलू की फसल बचा भी ली जाए और वह पैदा होकर किसान के घर में आ जाए तो उससे अपेक्षित लाभ ले पाना किसान के लिए मुश्किल हो जाता है। सीजन में न तो किसान को उसकी उपज का समुचित दाम मिलता है ना ही पर्याप्त खपत ही होती है। इससे हजारों रुपये की लागत और श्रम लगाने के बाद भी किसान झेलने को मजबूर हो जाता है। कुरमैचा के किसान रमाशंकर बिंद ने कहा कि आलू की खेती से लेकर भंडारण तक खर्चीला काम है। ऐसे में किसानों को अच्छी उपज लेने के बावजूद दोहरी मार झेलनी पड़ती है। एक तो समुचित मूल्य नहीं मिलता ऊपर से भंडारण में भी धन खर्च होता है। पूर्वांचल में आलू की खपत खाने, मंडियों के अलावा कोल्ड स्टोर में ही हो पाती है। इससे पर्याप्त फायदा नहीं मिल पाता। दानूपुर पश्चिम पट्टी के किसान मल्लूराम बिंद ने कहा कि भदोही जिले में बड़े पैमाने पर आलू की खेती नहीं होती, लेकिन पश्चिमी यूपी के जिलों में यह प्रमुख खेती है। ऐसे में अगर किसानों को उनकी उपज का सही समर्थन मूल्य नहीं होगा तो मुश्किल होगी। सरकार को आलू किसानों के लिए पर्याप्त समर्थन मूल्य तय करने के साथ ही उनकी पूरी उपज की खरीद करने की व्यवस्था भी करनी चाहिए।
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खमरिया के किसान किशोर चंद्र बरनवाल ने कहा कि तमाम झंझावातों के बाद जतन कर अगर आलू की फसल बचा भी ली जाए और वह पैदा होकर किसान के घर में आ जाए तो उससे अपेक्षित लाभ ले पाना किसान के लिए मुश्किल हो जाता है। सीजन में न तो किसान को उसकी उपज का समुचित दाम मिलता है ना ही पर्याप्त खपत ही होती है। इससे हजारों रुपये की लागत और श्रम लगाने के बाद भी किसान झेलने को मजबूर हो जाता है। कुरमैचा के किसान रमाशंकर बिंद ने कहा कि आलू की खेती से लेकर भंडारण तक खर्चीला काम है। ऐसे में किसानों को अच्छी उपज लेने के बावजूद दोहरी मार झेलनी पड़ती है। एक तो समुचित मूल्य नहीं मिलता ऊपर से भंडारण में भी धन खर्च होता है। पूर्वांचल में आलू की खपत खाने, मंडियों के अलावा कोल्ड स्टोर में ही हो पाती है। इससे पर्याप्त फायदा नहीं मिल पाता। दानूपुर पश्चिम पट्टी के किसान मल्लूराम बिंद ने कहा कि भदोही जिले में बड़े पैमाने पर आलू की खेती नहीं होती, लेकिन पश्चिमी यूपी के जिलों में यह प्रमुख खेती है। ऐसे में अगर किसानों को उनकी उपज का सही समर्थन मूल्य नहीं होगा तो मुश्किल होगी। सरकार को आलू किसानों के लिए पर्याप्त समर्थन मूल्य तय करने के साथ ही उनकी पूरी उपज की खरीद करने की व्यवस्था भी करनी चाहिए।
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