{"_id":"6a02c7fe1aa763b83d00901d","slug":"25-days-25-stories-drank-20-anna-lassi-without-paying-returned-from-america-to-repay-20-000-in-varanasi-2026-05-12","type":"story","status":"publish","title_hn":"25 दिन, 25 कहानियां: बिना मनी ऑर्डर के पी गए 20 आने की लस्सी, अमेरिका से आकर लौटाए 20 हजार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
25 दिन, 25 कहानियां: बिना मनी ऑर्डर के पी गए 20 आने की लस्सी, अमेरिका से आकर लौटाए 20 हजार
Tue, 12 May 2026 11:56 AM IST
Pragati Chand
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: Pragati Chand
Updated Tue, 12 May 2026 11:56 AM IST
सार
Varanasi News: पहलवान लस्सी के अधिष्ठाता मनोज कुमार यादव ने कहा कि सूरज निकलते ही गंगा स्नान, बाबा का ध्यान और कचौड़ी छान, यही तीन काम बनारसियों को कल की फिक्र से दूर रखता था।
विज्ञापन
मनोज कुमार यादव, पहलवान लस्सी, लंका
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
कभी 20 आने में उधार की लस्सी पीने वाला बीएचयू का अध्येता 30 साल बाद आईटी एक्सपर्ट बनकर काशी को 20 हजार रुपये लौटा गया। एक झुकी में 500 दंड मार देबा त एक पाव मलाई खियाईब... की बाजी लगाकर अखाड़ों में धोबी पछाड़ मारे जाते थे। अखाड़ा आज भी होता है मगर उस दौर के जैसे नहीं। आज का जेन जी आकर पूछता है कि मलाई-रबड़ी क्या होता है, क्योंकि उसका रुझान पिज्जा में है। तब से अब में यही अंतर आया है। सूरज निकलते ही गंगा स्नान, बाबा का ध्यान और कचौड़ी छान, यही तीन काम बनारसियों को कल की फिक्र से दूर रखता था। तब बनारस भविष्य के तनाव में नहीं जीता था और रात रबड़ी-मलाई खा के ही सोता था।
विज्ञापन
तब काशी में बाहरी यात्रियों का इतना आना नहीं होता था। बीएचयू वाले और खांटी फक्कड़ ही लस्सी का घंटों लुत्फ उठाते थे। लस्सी तो तब भी मथती थी लेकिन वह हर ग्राहक के लिए अलग-अलग बनती थी। जैसे कि आज की स्पेशल चाय अलग से पकती है। तब परंपरागत भोजन पर ज्यादा फोकस रहता था। रात के खाने के बाद कोल्ड ड्रिंक का नहीं पता लेकिन लोग दूध-रबड़ी और लस्सी-मलाई लेकर ही घर जाते थे। फक्कड़ी यहां आ जाए तो कहते थे, पहलवान दू ठे लस्सी बनावा त मिजाज में...। हर एक चीज में स्वाद और बातों में आत्मीयता थी। हालांकि तब तो कई लोग पीकर भाग भी जाते थे और उनकी पहचान करने वाला कोई सीसीटीवी नहीं था, लेकिन पिताजी को सबका चेहरा याद रहता था।
विज्ञापन
एक बार 2000 के बाद बीएचयू में एक पुरा छात्र सम्मेलन हुआ। उसी में अमेरिका से एक वैज्ञानिक आए। पिता जी को खोजने लगे तो हमने कहा, पिता जी अब नहीं रहे। फिर उनकी आंखें भर आईं और कहा कि बीएचयू में पढ़ाई के दौरान लस्सी पीने आया था तो पैसे नहीं थे। आपके पिता से अनुरोध कर कहा कि मनी ऑर्डर आते ही 20 आने चुका देंगे। मनी ऑर्डर तो आया लेकिन 20 आने चुकाना भूल गया। पासआउट होकर दिल्ली चला गया और फिर वहां से अमेरिका जा बसा। पुरा छात्र सम्मेलन में यहां आने का मौका मिला। अब यहां आया हूं उनके रुपये चुकाने। उस वैज्ञानिक ने कोविड में जब महीनों दुकानें बंद रहीं तो 20 हजार का पार्सल भेजवाया।
विज्ञापन
तब का लंका शेरो-शायरी, साहित्य, चाय, लस्सी, कचौड़ी ही छानता था। आज के जैसे कवाब पराठा या पिज्जा नहीं। सप्ताह में एक या दो बार चाट और गोलगप्पे खा लेते थे। संकट मोचन दर्शन कर लौटने वाले हों या बाबा विश्वनाथ के भक्त, इधर हाजिरी देकर ही कहीं और जाते थे। इनके अलावा तुलसी घाट के स्वामीनाथ अखाड़ा, गया सेठ के अखाड़ा और अवघड़ नाथ के अखाड़े में जाने वाले भी इधर से लस्सी-रबड़ी जमा कर ही जाते थे। -मनोज कुमार यादव, पहलवान लस्सी, लंका