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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   25 Days 25 Stories Beniabagh—Where Queen Victoria Statue Toppled and Clarion Call for Democracy Sounded

25 दिन-25 कहानियां: बेनियाबाग...जहां गिराई थी विक्टोरिया की मूर्ति, बजा था लोकतंत्र का बिगुल; रोचक जानकारी

Wed, 27 May 2026 03:45 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Wed, 27 May 2026 03:45 PM IST
सार

पुराने बनारस के लोगों के लिए बेनियाबाग किसी मैदान का नाम भर नहीं था, बल्कि एक ऐसा जीवंत मंच था जहां इतिहास रोज उतरता था। बनारस में फुटबॉल अगर कहीं पलता था तो बेनियाबाग की मिट्टी में। यही वजह थी कि इसे फुटबॉल की नर्सरी कहा जाने लगा। इस मैदान ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी दिए। सुबह-सुबह लड़कों की टोली नंगे पैर गेंद के पीछे दौड़ती थी और शाम तक मैदान धूल, पसीने और सपनों से भर जाता था।

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25 Days 25 Stories Beniabagh—Where Queen Victoria Statue Toppled and Clarion Call for Democracy Sounded
विजय नारायण सिंह। - फोटो : संवाद

विस्तार

बेनियाबाग सिर्फ पार्क नहीं था, शहर की धड़कन था। वहां सुबह की आंखें फुटबॉल की सीटी से खुलती थीं, दोपहर राजनीतिक बहसों में तपती थी और शामें जनसभाओं के नारों में डूब जाती थीं। पुराने बनारस के लोगों के लिए बेनियाबाग किसी मैदान का नाम भर नहीं था, बल्कि एक ऐसा जीवंत मंच था जहां इतिहास रोज उतरता था। 

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एक समय यहां खेल के दो बड़े मैदान हुआ करते थे। बनारस में फुटबॉल अगर कहीं पलता था तो बेनियाबाग की मिट्टी में। यही वजह थी कि इसे फुटबॉल की नर्सरी कहा जाने लगा। इस मैदान ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी दिए। सुबह-सुबह लड़कों की टोली नंगे पैर गेंद के पीछे दौड़ती थी और शाम तक मैदान धूल, पसीने और सपनों से भर जाता था।
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लेकिन, बेनियाबाग की पहचान सिर्फ खेल तक सीमित नहीं रही। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब उनकी अस्थियां देशभर में ले जाई जा रही थीं, तब तत्कालीन सांसद और संविधान सभा के सदस्य डॉ. रघुनाथ सिंह एक कलश काशी लाए। उस कलश को बेनियाबाग में रखा गया।

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बाद में वहां एक स्मृति स्तंभ बना। इसी बाग में अंग्रेजी हुकूमत की एक और निशानी खड़ी थी, महारानी विक्टोरिया की मूर्ति। आजादी के बाद भी वह मूर्ति वर्षों तक वहीं रही। फिर 1956 में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद के प्रतीकों को हटाने का आंदोलन शुरू किया। बनारस में इस आंदोलन की कमान राजनारायण ने संभाली।

छह मई 1957 का दिन काशी की राजनीति में हमेशा याद किया जाता है। राजनारायण ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद को नोटिस देकर मूर्ति हटाने की मांग की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उस शाम सेनपुरा मोहल्ले से राजनारायण के नेतृत्व में एक जुलूस निकला। बेनियाबाग पुलिस छावनी में बदल चुका था। जगतपुर के भारत सिंह गौतम आगे बढ़े। 

पुलिस की घेराबंदी पार कर वह मूर्ति तक पहुंचे और देखते-देखते विक्टोरिया की मूर्ति नीचे गिरा दी गई। बाद में 1995 में जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इसी स्थल का नाम राजनारायण के नाम पर रख दिया और उनकी प्रतिमा भी लगवाई।

बेनियाबाग राजनीतिक सभाओं का भी सबसे बड़ा मंच था। 1957 में यहां जवाहरलाल नेहरू की सभा हुई। बाद के वर्षों में शायद ही कोई बड़ा नेता रहा हो जो यहां न आया हो। इंदिरा गांधी से लेकर चौधरी चरण सिंह तक ने यहां जनसभाएं कीं। मैदान भर जाता था लोग पेड़ों पर चढ़ जाते थे। 

राजनारायण का सबसे बड़ा राजनीतिक संघर्ष भी बनारस की गलियों से ही ताकत पाता रहा। 1971 में वह रायबरेली से इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़े और हार गए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। आरोप लगाया कि सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हुआ है। 12 जून 1975 को अदालत ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। 

यह फैसला पूरी दुनिया में सुर्खियां बना और राजनारायण अचानक राष्ट्रीय राजनीति के सबसे बड़े चेहरे बन गए। बनारस में उनके समर्थन में जुलूस निकले, मिठाइयां बंटी और शहर कई दिनों तक जश्न में डूबा रहा। लेकिन इसके तुरंत बाद देश में इमरजेंसी लग गई। राजनारायण डेढ़ साल जेल में रहे। उसी दौर में बनारस के घाट, पक्का महाल की गलियां और गंगा किनारे के कई पुराने मकान लोकतंत्र सेनानियों के सुरक्षित ठिकाने बने। 

रणभेरी नाम की पत्रिका का दोबारा प्रकाशन शुरू हुआ। हर महीने बुलेटिन छपते और चोरी-छिपे लोगों तक पहुंचाए जाते। उस समय काशी सिर्फ मंदिरों की नगरी नहीं थी, वह प्रतिरोध की राजधानी भी थी। और उस प्रतिरोध की सबसे बुलंद गूंज अगर कहीं सुनाई देती थी, तो वह बेनियाबाग ही था। रणभेरी छापने वाले लोग घाटों का आश्रय लेते थे, पक्का महाल और इस इलाके की गलियों के मकान सबसे सुरक्षित जगहें थीं। - विजय नारायण सिंह, समाजवादी चिंतक

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