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आओ कि आदिकेशव बुलाते हैं

Sun, 20 Jan 2019 01:50 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 20 Jan 2019 01:50 AM IST
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आओ कि आदिकेशव बुलाते हैं
शहर की चहल पहल, शोर से दूर एक पुराना छोर छितरा सा पड़ा है। गंगा-वरुणा का संगम स्थल पुराणों का यह श्वेतद्वीप तपते मरु सा नजर आता है। वरुणा का विलाप और गंगा का करुण गान दोनों यहां गले मिलते हैं। भगवान विष्णु का पादोदक तीर्थ आस्था की पदचाप से दूर अपने वैभवशाली अतीत की परछाई में...
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वाराणसी। झांकता रहता है। तीर पर आदिकेशव मंदिर समूह एकल-विकल खड़ा है। कभी जो कीर्ति के शिखर पुंज थे, अब अपने पतन की कथा कह रहे हैं। शनै:शनै: संकुचित होते इस मंदिर संकुल की दयनीय दशा कह रहे हैं। एक ओर छैनी-हथौड़ों की चोट से ओट में छिपे कलात्मक शिवालय सहमे हुए बाहर झांक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आदिकेशव आवरण रहित होते हुए भी अनदेखे हैं। मंदिर के सेवक स्वयं पुरातत्व विभाग से इसे अपने संरक्षण में लेने के लिए पत्र लिख चुके हैं लेकिन किसी ने इस प्राचीन विष्णु तीर्थ की सुध नहीं ली। कितनी बड़ी विड़ंबना है ना। कभी समय निकालकर चले आओ इस तीर पर... आओ कि आदिकेशव बुलाते हैं।
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राजघाट से सराय मोहाना गांव के लिए रास्ता जाता है। वहीं गंगा-वरुणा संगम स्थली आदिकेशव घाट है। किनारे पर मकानों से घिरा हुआ आदिकेशव मंदिर समूह नजर आता है। अंग शिखरों से युक्त शिखर पुंज सहज ही ध्यानाकर्षित करते हैं। इस पौराणिक व ऐतिहासिक विरासत को सबने बिसार दिया है। वरुणा की दशा सब जानते हैं। घाट का निचला हिस्सा कच्चा है। जहां भैंसों के झुंड नहाते दिखते हैं।
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एक परकोटे में चार मंदिर आदिकेशव, ज्ञानकेशव, पंचदेवता और संगमेश्वर हैं। स्थापत्य की दृष्टि से भी ये मंदिर दर्शनीय हैं। आदिकेशव मंदिर का रंगमंडप लाल पाषाण के कलात्मक स्तंभों से समृद्ध हैं। बाहर की दीवारों पर भी सुंदर कारीगरी है। गर्भगृह में आदिकेशव विराजमान हैं। उनके दाईं ओर केशवादित्य हैं। दूसरे मंदिर में ज्ञानकेशव की मूर्ति स्थापित है। नीचे ज्ञानकेश्वर महादेव प्रतिष्ठित हैं। तीसरे मंदिर में संगमेश्वर महादेव के दर्शन हैं जिनकी गणना चतुर्दश आयतनों में होती है। स्कंद पुराण के अनुसार इनका दर्शन कर मनुष्य पाप रहित हो जाता है। चौथा पंचदेवता मंदिर है। जहां एक पीठिका पर विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य, गणेश का अंकन उनके वाहन द्वारा किया गया है।
आदिकेशव मंदिर समूह में सन्नाटा पसरा रहता है। केवल कुछ तिथियों पर यहां श्रद्धा का समागम होता है। पूस मास में अंतगृही मेला, चैत्र में वारुणी मेला में श्रद्धालु यहां संगम स्नान कर आदिकेशव के दर्शन करते हैं। भादो में वामन द्वादशी के दिन भी स्नान होता है। नीचे वामन भगवान का मंदिर भी है। परकोटे के बाहर चिंताहरण गणेश मंदिर है जिसमें गणेश जी के साथ वेदेश्वर, नक्षत्रेश्वर के शिवलिंग विराजमान हैं।
आदिकेशव मंदिर के पुजारी राजेश कुमार त्रिपाठी ने बताया, 1857 की क्रांति में ब्रिटिश सेना ने मंदिर पर कब्जा करके इसे अपना हेडक्वार्टर बना लिया था। किसी को मंदिर में अंदर जाने की अनुमति नहीं थी। उस वक्त हमारे पूर्वजों ने यहां के कमिश्नर के समक्ष यह मामला रखा। उनके ऑर्डर से मंदिर में एक पुजारी को पूजा करने की अनुमति मिली। उसका शिलालेख भी है।
यहां की व्यवस्था उचित नहीं है। हम लोग भगवान की सेवा में सक्षम नहीं हैं। परिवारों के बढ़ने से मंदिर के आसपास अतिक्त्रस्मण भी हो गया है। हम लंबे समय से कह रहे हैं कि सरकार इसे अपने नियंत्रण में ले ले। इसके लिए मैंने 2008 में उप्र शासन, पुरातत्व विभाग को कई पत्र भी लिखे पर किसी ने इसके संरक्षण की तरफ ध्यान नहीं दिया। इससे पहले पिताजी ने भी खूब कागजी कार्यवाही की। उनकी पूरी फाइल हमारे पास है। अलग थलग पड़ जाने से इस क्षेत्र का विकास नहीं हुआ न ही प्रचार-प्रसार। न यहां सरकारी नल है और न सीवर लाइन। कमलापति त्रिपाठी के समय में यह घाट बना था। नीचे की तरफ कच्चा है।
कथा आदिकेशव की
काशीखंड के अनुसार शिव जी के कहने पर भगवान विष्णु लक्ष्मी जी के साथ मंदराचल से काशी की ओर अग्रसर हुए। वहां पहुंचने पर उन्होंने गंगा-वरुणा संगम स्थल पर निर्मल चित्त से हाथ-पैर धोये व जो वस्त्र पहने हुए थे, उसे पहने हुए ही स्नान किया। भगवान ने प्रथमत: मंगलप्रद अपने चरणद्वय को वहां प्रक्षालित किया। तभी से वह तीर्थ पादोदक नाम से प्रसिद्ध हुआ। लक्ष्मी तथा गरुण के साथ आदिकेशव विष्णु ने नित्यकर्म संपन्न करके वहां अपने हाथों से अपनी मूर्ति का निर्माण कर यहां उसकी प्रतिष्ठा, पूजन किया। काशी के सीमांत का यह स्थान श्वेतद्वीप कहा गया है। जो मनुष्य पादोदक तीर्थ में स्नान करेंगे, उनका सहस्त्रजनमार्जित पाप शीघ्र नष्ट हो जाएगा। काशीखंड में बिंधुमाधव कहते हैं- श्वेतद्वीप में मैं ज्ञानकेशव नाम से स्थित होकर मनुष्य को ज्ञान प्रदान करता हूं।

इतिहास
आदिकेशव घाट काशी का प्रमुख व प्राचीन विष्णु तीर्थ माना जाता है। मंदिर समूह में संगमेश्वर 18 वीं शती के उत्तरार्द्ध व अन्य 19 वीं शती के प्रारंभ के हैं। मूलत: आदिकेशव मंदिर का निर्माण गहड़वाल काल में हुआ था। जिसे 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने नष्ट कर दिया था। गहड़वाल काल में आदिकेशव बहुत विख्यात था। गहड़वाल शासकों द्वारा मंदिर के नीचे गंगा में स्नान व महादान का उल्लेख भी मिलता है। वर्तमान मंदिर का निर्माण मराठा काल में ग्वालियर महाराजा सिंधिया के दीवान माणो जी ने 1806 ई. में कराया था। (जिला सांस्कृतिक समिति, वाराणसी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘काशी के मंदिर और मूर्तियां’ से साभार)
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