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हेराफेरी करके 270 बीघा भूमि पर दर्ज करा लिया नाम
Updated Tue, 21 Nov 2017 02:18 AM IST
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वाराणसी/सेवापुरी। आराजीलाइन विकास खंड क्षेत्र के खास आराजीलाइन राजस्व गांव में यूपी कृषि डेयरी फार्म विभाग की लगभग 270 बीघा भूमि का नामांतरण करा लिया गया। राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी कर 70 लोगों ने इस जमीन को खतौनी में अपने नाम करा लिया। इसका खुलासा एडीएम प्रशासन मुनीन्द्र नाथ उपाध्याय की अध्यक्षता में गठित टीम की जांच में हुआ। यह जांच शासन के निर्देश पर डीएम ने सितंबर 2017 में करवाई थी।
आराजीलाइन राजस्व गांव में लगभग 270 बीघा भूमि कुछ किसानों ने 1952 में कोआपरेटिव सोसायटी फार्मिंग के नाम से रजिस्ट्रेशन करवाकर खेती करने के लिए भूमि ले लिया। वर्ष 1955 के बाद सोसायटी सिर्फ कागजों पर सीमित रही। सोसायटी रजिस्टर्ड होने के पूर्व ही वर्ष 1951 में सोसायटी के लोगों ने भूमि छोड़ने के बजाय राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी करके खतौनी में अपना नाम दर्ज करवा लिए। सोसायटी के लोगों ने सरकार से दावा किया है कि 1951 में शासनादेश के तहत इस भूमि पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों के आदेश पर खतौनी में सोसायटी के किसानों का नाम अंकित हुआ है। जांच में मिला कि कई प्रपत्रों में सिर्फ शासनादेश का जिक्र किया गया है। किंतु किस शासनादेश के तहत राजस्व अधिकारियों ने खतौनी में नाम दर्ज कराने का आदेश दिया वह प्रपत्र उपलब्ध नहीं है। जांच में यह खुलासा हुआ कि सोसायटी का रजिस्ट्रेशन 1952 में हुआ तो वर्ष 1951 में लोगों के नाम कैसे खतौनी में दर्ज की गई। राजातालाब के तहसीलदार ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने बताया कि वर्ष 2010 में लालता सिंह व बृजबिहारी सिंह ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर प्रशासन भूमि से बेदखल न करने की मांग की थी। एडीएम प्रशासन की अध्यक्षता में हुई जांच में पता चला कि लोगों ने अभिलेखों में हेराफेरी करके खतौनी में अपना नाम दर्ज करवाया। जिलाधिकारी की तरफ से मेरे द्वारा बीते 15 नवंबर को उच्च न्यायालय में जवाब दाखिल किया गया है। इसकी जांच रिपोर्ट भी शासन को भेजी जा चुकी है।
मुनींद्रनाथ उपाध्याय, एडीएम प्रशासनने बताया कि करीब चार महीने पूर्व मामले की जांच कर रिपोर्ट डीएम को दी गई थी। जिस शासनादेश के तहत लोग जमीन पर कब्जा कर खेती कर रहे हैं वह शासनादेश अब तक नहीं मिल पाया है। लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है। मामला हाईकोर्ट में है और राजातालाब तहसील ने काउंटर लगाया है।
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आराजीलाइन राजस्व गांव में लगभग 270 बीघा भूमि कुछ किसानों ने 1952 में कोआपरेटिव सोसायटी फार्मिंग के नाम से रजिस्ट्रेशन करवाकर खेती करने के लिए भूमि ले लिया। वर्ष 1955 के बाद सोसायटी सिर्फ कागजों पर सीमित रही। सोसायटी रजिस्टर्ड होने के पूर्व ही वर्ष 1951 में सोसायटी के लोगों ने भूमि छोड़ने के बजाय राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी करके खतौनी में अपना नाम दर्ज करवा लिए। सोसायटी के लोगों ने सरकार से दावा किया है कि 1951 में शासनादेश के तहत इस भूमि पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों के आदेश पर खतौनी में सोसायटी के किसानों का नाम अंकित हुआ है। जांच में मिला कि कई प्रपत्रों में सिर्फ शासनादेश का जिक्र किया गया है। किंतु किस शासनादेश के तहत राजस्व अधिकारियों ने खतौनी में नाम दर्ज कराने का आदेश दिया वह प्रपत्र उपलब्ध नहीं है। जांच में यह खुलासा हुआ कि सोसायटी का रजिस्ट्रेशन 1952 में हुआ तो वर्ष 1951 में लोगों के नाम कैसे खतौनी में दर्ज की गई। राजातालाब के तहसीलदार ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने बताया कि वर्ष 2010 में लालता सिंह व बृजबिहारी सिंह ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर प्रशासन भूमि से बेदखल न करने की मांग की थी। एडीएम प्रशासन की अध्यक्षता में हुई जांच में पता चला कि लोगों ने अभिलेखों में हेराफेरी करके खतौनी में अपना नाम दर्ज करवाया। जिलाधिकारी की तरफ से मेरे द्वारा बीते 15 नवंबर को उच्च न्यायालय में जवाब दाखिल किया गया है। इसकी जांच रिपोर्ट भी शासन को भेजी जा चुकी है।
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मुनींद्रनाथ उपाध्याय, एडीएम प्रशासनने बताया कि करीब चार महीने पूर्व मामले की जांच कर रिपोर्ट डीएम को दी गई थी। जिस शासनादेश के तहत लोग जमीन पर कब्जा कर खेती कर रहे हैं वह शासनादेश अब तक नहीं मिल पाया है। लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है। मामला हाईकोर्ट में है और राजातालाब तहसील ने काउंटर लगाया है।
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