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गुरु शिष्य परंपरा का अंग है जिज्ञासा-प्रो.हरि प्रसाद अधिकारी
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वाराणसी। काशी कथा की ओर से आईआईटी बीएचयू में चल रही चौदह दिवसीय कार्यशाला के तीसरे दिन काशी की संस्कृ ति पर विद्वानों ने चर्चा की। बतौर मुख्य वक्ता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. हरि प्रसाद अधिकारी ने कहा कि जिज्ञासा गुरु शिष्य परंपरा का ही अंग है। प्रगति के लिए जिज्ञासा बहुत जरूरी है।
मालवीय उद्यमिता संवर्धन केंद्र में आयोजित कार्यशाला में प्रो. अधिकारी ने काशी की गुरु शिष्य परंपरा पर बोलते हुए कहा कि काशी को समझने के लिए तत्व जिज्ञासु बनने की जरूरत है। कहा कि गुरु शिष्य परंपरा बहुत समृद्ध रही है और यही एक ऐसी जगह है जहां हर गली में विद्वान मिल जाएंगे। वैश्वीकरण के इस दौर में जिस तरह से वर्तमान में जहां कुछ लोग प्राचीन संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, ऐसे में अपनी प्राचीन संस्कृति के साथ गुरु शिष्य परंपरा को लेकर आगे बढ़ना होगा। संस्कृत साहित्य एवं काशी पर बोलते हुए प्रो. सुधाकर मिश्र ने कहा कि काशी में अध्ययन-अध्यापन वस्त्र नहीं अन्त:वस्त्र के भीतर जो छिपा मन है वह करता है। यही इसकी श्रेष्ठता है। काशी मे छिपे असि शब्द का अर्थ ही तलवार है जो अज्ञान को अपने धार से नष्ट करता है।कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो.एसएन उपाध्याय, संचालन प्रो.पीके मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनूपपति त्रिपाठी ने किया। इस दौरान डॉ. विकास सिंह, गोपेश पाण्डेय, अरविन्द मिश्र, दीपक तिवारी, शशि दूबे, जयप्रकाश चतुर्वेदी, प्रकाश चंद्र पांडेय आदि मौजूद रहे।
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मालवीय उद्यमिता संवर्धन केंद्र में आयोजित कार्यशाला में प्रो. अधिकारी ने काशी की गुरु शिष्य परंपरा पर बोलते हुए कहा कि काशी को समझने के लिए तत्व जिज्ञासु बनने की जरूरत है। कहा कि गुरु शिष्य परंपरा बहुत समृद्ध रही है और यही एक ऐसी जगह है जहां हर गली में विद्वान मिल जाएंगे। वैश्वीकरण के इस दौर में जिस तरह से वर्तमान में जहां कुछ लोग प्राचीन संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, ऐसे में अपनी प्राचीन संस्कृति के साथ गुरु शिष्य परंपरा को लेकर आगे बढ़ना होगा। संस्कृत साहित्य एवं काशी पर बोलते हुए प्रो. सुधाकर मिश्र ने कहा कि काशी में अध्ययन-अध्यापन वस्त्र नहीं अन्त:वस्त्र के भीतर जो छिपा मन है वह करता है। यही इसकी श्रेष्ठता है। काशी मे छिपे असि शब्द का अर्थ ही तलवार है जो अज्ञान को अपने धार से नष्ट करता है।कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो.एसएन उपाध्याय, संचालन प्रो.पीके मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनूपपति त्रिपाठी ने किया। इस दौरान डॉ. विकास सिंह, गोपेश पाण्डेय, अरविन्द मिश्र, दीपक तिवारी, शशि दूबे, जयप्रकाश चतुर्वेदी, प्रकाश चंद्र पांडेय आदि मौजूद रहे।
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