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अब ये हाथ क्रोशिये से बुन रहे चटख तकदीर

Fri, 17 Nov 2017 01:46 AM IST
Updated Fri, 17 Nov 2017 01:46 AM IST
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अब ये हाथ क्रोशिये से बुन रहे चटख तकदीर
वाराणसी। लीला और उसके पांच बच्चों की जिंदगी आज बदल गई है। कभी घाट पर भीख मांगने वाली लीला आज आत्मनिर्भर है, आत्मसम्मान के साथ जिंदगी जी रही है। उसके सभी बच्चे स्कूल जा रहे हैं और अपना भविष्य संवार रहे हैं। लीला जैसी ही बेबसी, गरीबी को अपनी नियति मानकर कभी भिक्षा मांगने वाली कई महिलाएं आज अपनी जिंदगी का अंधेरा दूर करने में जुटी हैं। मुफलिसी से जार-जार हो चुकीं इन महिलाओं को एक विदेशी महिला का सहारा मिला। चंद सिक्कों के लिए फैलने वाले हाथों ने अब क्रोशिया पकड़ लिया है और इससे ही खुद की चटख तकदीर लिख रही हैं।
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उनकी आंखों की बेबसी को आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का सहारा दिया अर्जेंटीना की जेसुमेल ने। करीब छह साल पहले जेसुमेल काशी आईं थीं। उन्होंने अस्सी घाट पर महिलाओं और बच्चों को भीख मांगते देखा। इससे काफी व्यथित हुईं। उन्हें प्रेरित किया कि वे थोड़ी सी मेहनत करें तो न सिर्फ अपनी जिंदगी को बदल सकती हैं बल्कि अपने बच्चों को भविष्य भी संवार सकती हैं। फिर क्या था, दो महिलाएं लीला और सपना ने उनका हाथ थाम लिया। उनकी ‘जेसू’ दीदी ने उन्हें क्रोशिये से बैग, टोपी, मोजे, माला, गुड़िया समेत कई चीजें बनानी सिखाईं। अस्सी घाट पर ही दुकान लगाकर उनके हुनर को खरीदार भी दिलवाए। खास तौर से घाट पर आने वाले विदेशियों को प्रेरित किया कि उनके हाथों के बने सामान खरीदें।
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दो महिलाओं के साथ शुरू हुई जेसुमेल की इस मुहिम ने आज समुद्री, लीलावती, चनर्मी, आशा, शांति, सपना, चंदा समेत 12 से अधिक भीख मांगने वाली महिलाओं की जिंदगी बदल दी। उन्होंने भीख मांगना छोड़ दिया है। हाथ से तैयार अपने सामान के साथ अब वे माला, रुद्राक्ष, ब्रेसलेट समेत कई चीजें खरीदकर लाती हैं और उन्हें घाट पर बेचती हैं।
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लीलावती बताती हैं कि वे और उनके पति महेंद्र बाबा पहले भीख मांगते थे। घाट पर ही खुले आसमां के नीचे सोते थे लेकिन आज दोनों के सिर पर छत है। दोनों ही जेसू दीदी के लिए टोपी, बैग वगैरह तैयार करते हैं। जो कमाई होती है उससे घर का खर्च चलता है। उनके बच्चे भी स्कूल में पढ़ते हैं। जेसूमेल बताती हैं उनके साथ उनकी बहन जैकलेना ने भी उन महिलाओं के लिए काम किया। आज इन महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े देख काफी खुशी होती है लेकिन दुख होता है और मन में सवाल भी उठता है कि इन गरीबों के लिए यहां सरकार की योजनाएं कारगर क्यों नहीं हैं।
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