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मंच पर उतरी महाकवि की कालजयी रचना अभिज्ञान शाकुंतलम
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वाराणसी। नागरी नाटक मंडली में मंगलवार को महाकवि कालीदास की कालजयी रचना अभिज्ञान शाकुंतलम का सजीव मंचन किया गया। जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में नाट्य प्रेमी उपस्थित रहे।
अभिज्ञान शाकुंतलम नाटक में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत और मेनका की पुत्री शकुंतला की प्रेम कथा को दर्शाया गया है। राजा दुष्यंत जब हिरन का पीछा करते हुए ऋषि कण्व के आश्रम पहुंचते हैं तो यहां उनकी मुलाकात शकुंतला से होती है और दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। आगे चलकर दोनों गंधर्व विवाह कर लेते हैं।
दुष्यंत अपने राज्य लौटते समय अपनी अंगूठी शकुंतला को दे देते हैं । इसी बीच दुष्यंत के प्रेम में खोयी शकुंतला से दुर्वाषा ऋषि का अनादर हो जाता है। वे शकुंतला उसे शाप दे देते हैं, जिसके फलस्वरूप दुष्यंत शकुंतला को भूल जाते हैं। बाद में शकुंतला दुष्यंत के पास जाती हैं तो दुष्यंत शाप के प्रभाव से भरी सभा में गर्भवती शकुंतला को स्वीकार नहीं करते। कुछ समय पश्चात अंगूठी एक मछुआरे के द्वारा दुष्यंत तक वापस पहुंचती है। उसे देखते ही दुष्यंत को घोर पश्चाताप होता है और वो विरह से व्याकुल हो जाते हैं और फिर दुष्यंत शकुंतला को खोजकर अपना लेते हैं।
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अभिज्ञान शाकुंतलम नाटक में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत और मेनका की पुत्री शकुंतला की प्रेम कथा को दर्शाया गया है। राजा दुष्यंत जब हिरन का पीछा करते हुए ऋषि कण्व के आश्रम पहुंचते हैं तो यहां उनकी मुलाकात शकुंतला से होती है और दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। आगे चलकर दोनों गंधर्व विवाह कर लेते हैं।
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दुष्यंत अपने राज्य लौटते समय अपनी अंगूठी शकुंतला को दे देते हैं । इसी बीच दुष्यंत के प्रेम में खोयी शकुंतला से दुर्वाषा ऋषि का अनादर हो जाता है। वे शकुंतला उसे शाप दे देते हैं, जिसके फलस्वरूप दुष्यंत शकुंतला को भूल जाते हैं। बाद में शकुंतला दुष्यंत के पास जाती हैं तो दुष्यंत शाप के प्रभाव से भरी सभा में गर्भवती शकुंतला को स्वीकार नहीं करते। कुछ समय पश्चात अंगूठी एक मछुआरे के द्वारा दुष्यंत तक वापस पहुंचती है। उसे देखते ही दुष्यंत को घोर पश्चाताप होता है और वो विरह से व्याकुल हो जाते हैं और फिर दुष्यंत शकुंतला को खोजकर अपना लेते हैं।
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