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देखो कान्हा ने मोपे रंग डारी रे, नहीं माने लला...
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वाराणसी। होली का नाम लेते ही बस चारों तरफ रंग ही रंग नजर आते हैं। जीवन के सारे रंग समेटे हुए। चाहे वे रंग फूलों के हों, प्रकृति के, भावों के, रिश्तों के, चाहे समाज की समानता के और चाहे सुरों के। सब जन रंग में सराबोर, बृज में राधा कृष्ण की प्रेम भरी होली, अवध में रामलला की होली तो बनारस में बाबा विश्वनाथ की अड़भंगी होली। न तन की सुध न मन की सुध। बनारस का असली रस है यहां की होली और जब यह रंग बरसते हैं तो हर शख्स रंगीन नजर आता है।
शास्त्रीय गायिका पद्मश्री सोमा घोष कहती हैं कि हम लोगों की जिंदगी में उत्सव है। होरी के गीतों में प्रेेम, विरह, रूठना और मनाना सब शामिल हैं। राधा कान्हा से विनती कर रही हैं कि जनि मारो पिचकारी कन्हइया अरज कर हारी...। राधा की विनती के बाद भी कान्हा नहीं मानते हैं और वह चुपके से आकर राधा को अपनी पिचकारी से भिगो देते हैं। तब राधा विवशता से कहती हैं कि देखो कान्हा ने मोपे रंग डारी रे, नहीं माने लला...। शास्त्रीय गायिका कहती हैं कि होली का मतलब केवल उधम नहीं होता है। केवल हाथों में पिचकारी लेकर भिगोना ही होली नहीं है। होली तो हर दिन की होली होती है। जब हम किसी के लिए मन में सोचते हैं तो उस दिन होली होती है। अश्लीलता ने होली का मजा ही फीका कर दिया है। राधा ने भी गारी दी है कि गारी मैं दूंगी तोसे ना डरूंगी...। उसमें रस अश्लीलता नहीं है।
दो साल पहले गुरु मौनी बाबा के यहां जब होली खेली थी तो उसका आनंद कुछ अलग ही था। उस दौरान न कोई साज था न संगतकार। भंग का शरबत भी तैयार था। सभी चाहते थे कि मैं होरी गाऊं। गुरु जी की आज्ञा से जब गाना शुरू किया तो मेरे पति ने थाली ले ली, किसी ने लोटा तो किसी ने कोई बर्तन उठा लिया। इसके बाद जो होली का रंग जमा वह सभी को आनंद से भर गया। बाबा ने पहला भंग का शरबत मुझे दिया। वह मेरे लिए तो साक्षात शिव थे और मैंने शिव के साथ होली खेली।
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बनारस में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुंबई में रह रही पद्मश्री सोमा घोष अपने समय के महान फिल्मकार नवेंदु घोष की पुत्रवधू हैं। पिता मनमोहन चक्रवर्ती स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। संगीत की शिक्षा उन्होंने सेनिया घराने के पं. नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की बागेश्वरी देवी से ली। भारत रत्न पं. बिस्मिल्लाह खां ने सोमा घोष को गोद भी लिया था। वह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की एंबेसडर भी हैं।
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शास्त्रीय गायिका पद्मश्री सोमा घोष कहती हैं कि हम लोगों की जिंदगी में उत्सव है। होरी के गीतों में प्रेेम, विरह, रूठना और मनाना सब शामिल हैं। राधा कान्हा से विनती कर रही हैं कि जनि मारो पिचकारी कन्हइया अरज कर हारी...। राधा की विनती के बाद भी कान्हा नहीं मानते हैं और वह चुपके से आकर राधा को अपनी पिचकारी से भिगो देते हैं। तब राधा विवशता से कहती हैं कि देखो कान्हा ने मोपे रंग डारी रे, नहीं माने लला...। शास्त्रीय गायिका कहती हैं कि होली का मतलब केवल उधम नहीं होता है। केवल हाथों में पिचकारी लेकर भिगोना ही होली नहीं है। होली तो हर दिन की होली होती है। जब हम किसी के लिए मन में सोचते हैं तो उस दिन होली होती है। अश्लीलता ने होली का मजा ही फीका कर दिया है। राधा ने भी गारी दी है कि गारी मैं दूंगी तोसे ना डरूंगी...। उसमें रस अश्लीलता नहीं है।
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दो साल पहले गुरु मौनी बाबा के यहां जब होली खेली थी तो उसका आनंद कुछ अलग ही था। उस दौरान न कोई साज था न संगतकार। भंग का शरबत भी तैयार था। सभी चाहते थे कि मैं होरी गाऊं। गुरु जी की आज्ञा से जब गाना शुरू किया तो मेरे पति ने थाली ले ली, किसी ने लोटा तो किसी ने कोई बर्तन उठा लिया। इसके बाद जो होली का रंग जमा वह सभी को आनंद से भर गया। बाबा ने पहला भंग का शरबत मुझे दिया। वह मेरे लिए तो साक्षात शिव थे और मैंने शिव के साथ होली खेली।
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बनारस में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुंबई में रह रही पद्मश्री सोमा घोष अपने समय के महान फिल्मकार नवेंदु घोष की पुत्रवधू हैं। पिता मनमोहन चक्रवर्ती स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। संगीत की शिक्षा उन्होंने सेनिया घराने के पं. नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की बागेश्वरी देवी से ली। भारत रत्न पं. बिस्मिल्लाह खां ने सोमा घोष को गोद भी लिया था। वह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की एंबेसडर भी हैं।