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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Uttar Pradesh Foundation Day 2022 History Importance and Significance of UP Diwas

70 साल का हुआ उत्तर प्रदेश : 10 पॉइंट्स में जानें क्या है यूपी का चार हजार साल पुराना इतिहास, आजादी से पहले और बाद में क्या बदलाव हुआ?

Mon, 24 Jan 2022 03:19 PM IST
Himanshu Mishra हिमांशु मिश्रा
Updated Mon, 24 Jan 2022 03:19 PM IST
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सार
UP Foundation Day 2022: वैसे तो उत्तर प्रदेश का इतिहास चार हजार साल से भी पुराना है, लेकिन आज के ही दिन 1950 में राज्य को उत्तर प्रदेश का नाम मिला था। ऐसे में आज उत्तर प्रदेश अपना 70वां स्थापना दिवस मना रहा है। 
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Uttar Pradesh Foundation Day 2022 History Importance and Significance of UP Diwas
उत्तर प्रदेश का इतिहास - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर इन दिनों उत्तर प्रदेश चर्चा का केंद्र बिंदु बना हुआ है। देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में उत्तर प्रदेश से जुड़े मामलों और यहां की राजनीतिक हलचलों की गूंज सुनाई देने लगी है। आज प्रदेश का स्थापना दिवस भी है। ऐसे में हम आपको उत्तर प्रदेश के बार में बताने जा रहे हैं? आखिर कैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण और गौतम बुद्ध की धरती अंग्रेजों के हाथ में चली गई और फिर आजादी के बाद से अब तक क्या-क्या बदलाव हुए?  


1. ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही
उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग के मुताबिक, प्रदेश का इतिहास चार हजार साल पुराना है। उत्तर वैदिक काल में इसे ब्रहर्षि देश या मध्य देश के नाम से जाना जाता था। उत्तर प्रदेश वैदिक काल में कई ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही। महर्षि भारद्वाज, महर्षि गातम, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि जैसे महान ऋषि-मुनि यहीं से ताल्लुक रखते हैं। रामायण और महाभारत की कथा भी यहीं की है।


2. बौद्ध और जैन धर्म की शुरुआत हुई
छठीं शताब्दी में जैन और बौद्ध धर्म का विकास हुआ। भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ (वाराणसी) में ही दिया था और यहीं से उन्होंने बौद्ध धर्म की शुरुआत की। प्रदेश के कुशीनगर में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। तब अयोध्या, प्रयाग, काशी, मथुरा जैसी नगरी शिक्षा के लिए प्रसिद्ध केंद्र थे।

3. विदेशी शासकों के हाथ में चला गया प्रदेश
1206 ई. से विदेशी आक्रमणकारियों का शासन शुरू हो गया, तब दिल्ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन ऐबक बैठ चुका था। यहीं से उसने गुलाम वंश की स्थापना की। दिल्ली सल्तनत का दायरा बढ़ाते हुए उसने उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्से को अपने अधीन कर लिया। हालांकि, तब भी बदायूं, संभल और कड़ा रियासतें स्थानीय स्तर पर उससे खूब लड़ीं। 1394 में जौनपुर में शर्की साम्राज्य की स्थापना हुई। इसे तुगलक शासकों से विद्रोह करके उनके गवर्नर रहे मलिक सरवर ख्वाजा जहां ने स्थापित किया था। 1506 ई. में लोदी वंश के शासक सिकंदर लोदी ने दिल्ली की जगह आगरा को अपनी राजधानी बनाया। इसके बाद मुगल शासक औरंगजेब के समय बुंदेलखंड में वीर छत्रसाल ने विद्रोह शुरू कर दिया। वहीं, अवध में स्थानीय गवर्नर सादत अली खां ने 1732 में आजादी का एलान कर दिया। रोहिल शासकों ने भी इसी दौरान स्वतंत्र राज्य का एलान किया।  

4. अंग्रेजी हुकूमत ने कब्जा कर लिया
अवध के तीसरे नवाब के समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अवध के शासकों के संपर्क में आई थी। यहीं से अंग्रेजी हुकूमत का राज शुरू हो गया। तीन अप्रैल 1937 को पहली एसेंबली की शुरुआत हुई। गवर्नर हैरी ग्राहम ने नवाब छत्री और गोविंद वल्लभ पंत को यूनाइटेड प्रोविसेंस का मुख्यमंत्री बनाया। नवाब छत्री 1937 तक और पंत 1939 तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद 1946 तक गवर्नर शासन लग गया। 1946 में चुनाव के बाद गोविंद वल्लभ पंत को फिर यूनाइटेड प्रोविंसेस की कमान मिल गई।

5. 24 जनवरी 1950 को उत्तर प्रदेश नाम मिल गया
अंग्रेजों से आजादी के बाद 24 जनवरी 1950 को यूनाटेड प्रोविंसेस का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश कर दिया गया। 26 जनवरी 1950 को गोविंद वल्लभ पंत ने आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यभार संभाला। पंत ने बरेली से चुनाव लड़ा था। 1952 से यूपी के मुख्यमंत्री संपूर्णानंद हो गए।

6. सुचेता बनीं पहली महिला मुख्यमंत्री      
आजादी के बाद देश के किसी राज्य में पहली बार महिला मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड सुचेता कृपलानी के नाम दर्ज है। दो अक्तूबर 1963 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली थी। सुचेता का कार्यकाल तीन साल 162 दिन रहा। 13 मार्च 1967 को उनका निधन हो गया था। सुचेता ने संतकबीरनगर के मेंहडावल विधानसभा से चुनाव लड़ा था।

7. चौधरी चरण सिंह बने पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री
आजादी के बाद से 1967 तक उत्तर प्रदेश में जितने भी मुख्यमंत्री बने सभी कांग्रेस के नेता रहे। तीन अप्रैल 1967 को पहली बार किसी गैर कांग्रेसी को उत्तर प्रदेश की सत्ता मिली थी। वह थे चौधरी चरण सिंह। चौधरी साहब तब भारतीय क्रांति दल के मुखिया थे। उन्होंने छपरौली से चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी। उनका कार्यकाल 382 दिन का रहा। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

8. मायावती सबसे ज्यादा बार यूपी की सीएम रहीं
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती उत्तर प्रदेश की सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री रहीं। उन्हें चार बार (1995,1997,2002 और 2007) ये पद मिला। नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह यादव और चंद्रभानु गुप्ता ने तीन-तीन बार यूपी की सत्ता संभाली। भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह दो बार मुख्यमंत्री रहे।

9. नौ बार राष्ट्रपति शासन लगा
उत्तर प्रदेश में नौ बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। पहली बार 25 फरवरी 1968 से 26 फरवरी 1969 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। इससे पहले चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री थे। आखिरी बार 8 मार्च 2002 से तीन मई 2002 तक राष्ट्रपति शासन रहा।

10. चंद्रभानु गुप्ता का सबसे छोटा कार्यकाल
उत्तर प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता का सबसे छोटा कार्यकाल रहा। पहली बार वह दो साल 298 दिन तक मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उनका दूसरा कार्यकाल महज 19 दिन का रहा। चंद्रभानु गुप्ता तीसरी बार 1969 में मुख्यमंत्री बने। तब उनका कार्यकाल 365 दिन का था।
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