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चित्रकूट: हनुमान धारा की क्या है मान्यता, पुजारी ने बताई वर्षों पुरानी मंदिर की पूरी कहानी
Wed, 22 Dec 2021 02:09 PM IST
मुकेश कुमार झा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चित्रकूट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चित्रकूट
Published by: मुकेश कुमार झा
Updated Wed, 22 Dec 2021 02:09 PM IST
सार
'अमर उजाला' का चुनावी रथ 'सत्ता का संग्राम' चित्रकूट में है। चाय पर चर्चा और युवाओं से बातचीत के बाद हमारी टीम हनुमान धारा मंदिर पहुंची और यहां के मुख्य पुजारी से बात की। इस दौरान पुजारी ने हनुमान धारा की मान्यता के बारे में बताया...
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हनुमान धारा मंदिर, चित्रकूट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
चित्रकूट भगवान श्रीराम की तपोस्थली है। पूरी दुनिया में धर्म और आस्था की नगरी चित्रकूट का खास महत्व है। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान 11 साल चित्रकूट में बिताए थे। धर्म नगरी के प्राचीन हनुमान धारा तीर्थ स्थल से श्रद्धालुओं की आस्था वर्षों पुरानी है। यहां रोजाना तीर्थ यात्री दर्शन करने के लिए आते हैं। 'सत्ता का संग्राम' कार्यक्रम के तहत हमारी टीम हनुमान धारा मंदिर पहुंची और यहां के मुख्य पुजारी से बात की। इस दौरान पुजारी ने हनुमान धारा की मान्यता और इसकी विशेषता के बारे में बताया...
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पुजारी कमलेश प्रसाद मिश्रा ने कहा कि हनुमान जी महाराज ने लंका दहन किया था। उन्हें लंका जलाने की तपन रहती थी। उसी की शांति के लिए भगवान राम जिस समय राज्य इत्यादि करके साकेत जाते हैं, उस समय हनुमान जी महाराज भगवान राम की चरण सेवा में रहते थे। इस दौरान एक दिन भक्त हनुमान ने भगवन से कहा कि मैं तो जिसके लिए अवतार लिया था वह कार्य मेरा पूरा हो गया और मैं अब वैकुंठ जाना चाहता हूं। इस पर भगवन ने कहा कि आपको इसी मृत्यु लोक में रहना पड़ेगा। उस समय हनुमान जी महाराज ने भगवन से पूछा कि हमें इसी मृत्यु लोक में क्यों रहना पड़ेगा?
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उस समय भगवान राम ने कहा कि हनुमान याद करो कि जिस समय महारानी सीता जी अशोक वाटिका में पतिवियोग के मारे अपने प्राणों का परित्याग कर रही थीं, उस समय तुमने उन्हें हमारा संदेशा सुनाया, उन्हें हमारी दी हुई मुद्रिका दिया, तुमने महरानी सीता जी की प्राणों की रक्षा की, उसी समय महरानी सीता जी ने प्रसन्न होकर अजर तुम्हें अमर का आशीर्वाद दिया। इसलिए हनुमान तुम जो चाहे वो मांगो। इस पर भक्त हनुमान ने कहा कि भगवन हमें किसी भी चीज की जरूरत नहीं। इस पर भगवन ने कहा कि भक्त हनुमान आप जो चाहें हमसे मांगिए। यदि आप कुछ मांग लोगे तो मैं भी तुम्हारे ऋण से ऋणमुक्त हो जाऊंगा। तब भगवन ने हनुमान जी को अयोध्या से लाकर पर्वत माला पर स्थान दिया। भगवान ने बाण मारकर धारा का प्रवाह किया। पुजारी ने बताया कि धारा का पता नहीं कि कहां से आता है?
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यह स्थान पर्वतमाला के मध्यभाग में स्थित है। पहाड़ के सहारे हनुमानजी की एक विशाल मूर्ति के ठीक सिर पर दो जल के कुंड हैं, जो हमेशा जल से भरे रहते हैं और उनमें से निरंतर पानी बहता रहता है। पहाड़ी के शिखर पर स्थित हनुमान धारा में हनुमान की एक विशाल मूर्ति है। मूर्ति के सामने तालाब में झरने से पानी गिरता है। इस धारा का जल हनुमानजी को स्पर्श करता हुआ बहता है। इसीलिए इसे हनुमान धारा कहते हैं। यहां 12 महीनें भक्तों का आना जाना लगता रहता है।