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बांगरमऊ से अब तक कोई भी महिला विधानसभा नहीं पहुंची
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उन्नाव। बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र में अब तक हुए 14 चुनावों में पांच बार महिलाएं भी मैदान में उतर चुकी हैं। चुनाव में महिलाओं को जीत नहीं मिली। बांगरमऊ से अब तक कोई महिला विधानसभा में नहीं पहुंच सकी है।
आजादी के बाद से अब तक बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र में 14 चुनाव हो चुके हैं। वर्ष 1962 के चुनाव में बांगरमऊ विधानसभा सीट को अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित किया गया था। तब मतदाताओं ने जीत का सेहरा कांग्रेस के सेवाराम के सिर बांधा था। हालांकि चुनावी मैदान में महिलाओं के उतरने की शुरुआत 1980 के विधानसभा चुनाव में हुई।
उस समय जय देवी वर्मा ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरी थी। तब कांग्रेस के दिग्गज नेता गोपीनाथ दीक्षित और राघवेंद्र सिंह भी चुनावी मैदान में थे। जय देवी को मात्र 428 वोट ही मिल सके। उन्हें 10वें नंबर पर संतोष करना पड़ा। 1989 में फिर जय देवी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप से चुनावी मैदान में उतरीं। फिर उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। 305 वोट पाकर वह 9वें स्थान पर रहीं। वर्ष 1993 के चुनाव में अपूर्णा सिंह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में किस्मत आजमाने मैदान में उतरी। उन्हें भी जनता ने नकार दिया। परिणामस्वरूप 387 वोट पाकर 12वें स्थान पर रहीं। 2012 में आशारानी ने भी निर्दलीय चुनाव लड़ा था। उन्हें 1244 वोट मिले थे और वह 8वें स्थान पर रही थीं।
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पिता को जिताया, पुत्री पर भरोसा नहीं जताया
वर्ष 2007 में कांग्रेस के टिकट पर आरती बाजपेई ने बांगरमऊ से विधानसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हे 13375 वोट मिले थे। वह चौथे स्थान पर रही थीं। 2012 के चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने उनका टिकट काट दिया था। इस पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 17098 वोट हासिल किए। आरती बाजपेयी दिग्गज कांग्रेसी नेता गोपीनाथ दीक्षित की बेटी हैं। उनके पिता को जनता ने वर्ष 1969, 1980, 1985 और 1991 में बांगरमऊ से ही जिताकर विधानसभा भेजा था। वह प्रदेश सरकार में मंत्री और गृहमंत्री तक रहे, लेकिन बेटी को जनता ने एक भी मौका नहीं दिया। हालांकि इस बार उपचुनाव में कांग्रेस ने फिर से आरती बाजपेई पर ही भरोसा जताते हुए मैदान में उतारा है।
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आजादी के बाद से अब तक बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र में 14 चुनाव हो चुके हैं। वर्ष 1962 के चुनाव में बांगरमऊ विधानसभा सीट को अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित किया गया था। तब मतदाताओं ने जीत का सेहरा कांग्रेस के सेवाराम के सिर बांधा था। हालांकि चुनावी मैदान में महिलाओं के उतरने की शुरुआत 1980 के विधानसभा चुनाव में हुई।
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उस समय जय देवी वर्मा ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरी थी। तब कांग्रेस के दिग्गज नेता गोपीनाथ दीक्षित और राघवेंद्र सिंह भी चुनावी मैदान में थे। जय देवी को मात्र 428 वोट ही मिल सके। उन्हें 10वें नंबर पर संतोष करना पड़ा। 1989 में फिर जय देवी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप से चुनावी मैदान में उतरीं। फिर उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। 305 वोट पाकर वह 9वें स्थान पर रहीं। वर्ष 1993 के चुनाव में अपूर्णा सिंह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में किस्मत आजमाने मैदान में उतरी। उन्हें भी जनता ने नकार दिया। परिणामस्वरूप 387 वोट पाकर 12वें स्थान पर रहीं। 2012 में आशारानी ने भी निर्दलीय चुनाव लड़ा था। उन्हें 1244 वोट मिले थे और वह 8वें स्थान पर रही थीं।
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पिता को जिताया, पुत्री पर भरोसा नहीं जताया
वर्ष 2007 में कांग्रेस के टिकट पर आरती बाजपेई ने बांगरमऊ से विधानसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हे 13375 वोट मिले थे। वह चौथे स्थान पर रही थीं। 2012 के चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने उनका टिकट काट दिया था। इस पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 17098 वोट हासिल किए। आरती बाजपेयी दिग्गज कांग्रेसी नेता गोपीनाथ दीक्षित की बेटी हैं। उनके पिता को जनता ने वर्ष 1969, 1980, 1985 और 1991 में बांगरमऊ से ही जिताकर विधानसभा भेजा था। वह प्रदेश सरकार में मंत्री और गृहमंत्री तक रहे, लेकिन बेटी को जनता ने एक भी मौका नहीं दिया। हालांकि इस बार उपचुनाव में कांग्रेस ने फिर से आरती बाजपेई पर ही भरोसा जताते हुए मैदान में उतारा है।