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Unnao News: बिजली न होने से बेटियों के भविष्य में हो गया ‘अंधेरा’
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सफीपुर। शासन ने बेटियों को शिक्षा अति महत्वपूर्ण बताकर सुविधाएं उपलब्ध कराने का आश्वासन तो दे दिया पर नीबीगाड़ा में सरकारी दावा फेल नजर आ रहा है।
यहां आजादी के बाद से आज तक बिजली न पहुंच पाने से बेटियां उच्च शिक्षा नहीं हासिल कर सकीं और सिलाई मशीन थामने को मजबूर हो गईं।
सफीपुर विकासखंड की पंचायत गहोली के गांव नीबीगाड़ा में 18 वर्ष पूर्व खड़े किए गए बिजली खंभों में आज तक करंट नहीं दौड़ा। जिससे यहां की बेटियों की उच्च शिक्षा की इच्छा नहीं पूरी हो सकी। बेटियों का कहना है कि सुबह उठकर तैयार होने के बाद दो किलोमीटर दूर उच्च प्राथमिक स्कूल एतबारपुर या गहोली जाना होता था।
पैदल वापस आते-आते घरों में अंधेरा छाने लगता। फिर घर के कामों में हाथ बंटा सो जाने के अलावा कोई विकल्प न होने से पढ़ाई समाप्त होती गई।
पहले किरोसिन मिल जाता था, वह भी बंद हो गया तो लालटेन का सहारा भी खत्म हो गया। लिहाजा पढ़ाई बंद हो गई पर माता-पिता का सहारा बनने की चिंता में कलम छोड़ हाथों में सिलाई मशीन पकड़ ली। ऐसा लगता है नीबीगाड़ा गांव आज़ाद नहीं हुआ है।
गांव निवासी शीतल ने बताया कि माता-पिता पढ़ाना चाहते थे। सनहा गांव के कॉलेज से कक्षा आठ तक पढ़ाई की पर घर में बिजली न होने से तैयारी नहीं कर पाई। इसलिए नंबर कम आए तो पढ़ाई छोड़नी पड़ी। परिवार का सहारा बनने की चाहत थी पर गांव में छाए अंधेरे की तरफ जीवन भी अंधकारमय होने लगा तो सिलाई मशीन पकड़ ली।
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नीबीगाड़ा निवासी आरती ने बताया कि दो किलोमीटर दूर सनहा गांव स्थित कॉलेज में 10 तक पढ़ाई की पर घर में पढ़ाई न होने पर विद्यालय छोड़ना पड़ा। मां ने सिलाई सिखा दी, अब घर पर ही कपड़े सिलकर परिवार का सहारा बनने की कोशिश कर रही हैं।
अवर अभियंता बिजली दिलीप कुमार गुप्ता ने बताया कि अलग-अलग समय में इस्टीमेट के साथ तीन बार रिपोर्ट भेजी जा चुकी है। उच्चस्तरीय अधिकारियों द्वारा इस्टीमेट स्वीकृत कर विभागीय खर्च से या जनप्रतिनिध निधि से गांव में बिजली पहुंच सकती है।
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यहां आजादी के बाद से आज तक बिजली न पहुंच पाने से बेटियां उच्च शिक्षा नहीं हासिल कर सकीं और सिलाई मशीन थामने को मजबूर हो गईं।
सफीपुर विकासखंड की पंचायत गहोली के गांव नीबीगाड़ा में 18 वर्ष पूर्व खड़े किए गए बिजली खंभों में आज तक करंट नहीं दौड़ा। जिससे यहां की बेटियों की उच्च शिक्षा की इच्छा नहीं पूरी हो सकी। बेटियों का कहना है कि सुबह उठकर तैयार होने के बाद दो किलोमीटर दूर उच्च प्राथमिक स्कूल एतबारपुर या गहोली जाना होता था।
पैदल वापस आते-आते घरों में अंधेरा छाने लगता। फिर घर के कामों में हाथ बंटा सो जाने के अलावा कोई विकल्प न होने से पढ़ाई समाप्त होती गई।
पहले किरोसिन मिल जाता था, वह भी बंद हो गया तो लालटेन का सहारा भी खत्म हो गया। लिहाजा पढ़ाई बंद हो गई पर माता-पिता का सहारा बनने की चिंता में कलम छोड़ हाथों में सिलाई मशीन पकड़ ली। ऐसा लगता है नीबीगाड़ा गांव आज़ाद नहीं हुआ है।
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गांव निवासी शीतल ने बताया कि माता-पिता पढ़ाना चाहते थे। सनहा गांव के कॉलेज से कक्षा आठ तक पढ़ाई की पर घर में बिजली न होने से तैयारी नहीं कर पाई। इसलिए नंबर कम आए तो पढ़ाई छोड़नी पड़ी। परिवार का सहारा बनने की चाहत थी पर गांव में छाए अंधेरे की तरफ जीवन भी अंधकारमय होने लगा तो सिलाई मशीन पकड़ ली।
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नीबीगाड़ा निवासी आरती ने बताया कि दो किलोमीटर दूर सनहा गांव स्थित कॉलेज में 10 तक पढ़ाई की पर घर में पढ़ाई न होने पर विद्यालय छोड़ना पड़ा। मां ने सिलाई सिखा दी, अब घर पर ही कपड़े सिलकर परिवार का सहारा बनने की कोशिश कर रही हैं।
अवर अभियंता बिजली दिलीप कुमार गुप्ता ने बताया कि अलग-अलग समय में इस्टीमेट के साथ तीन बार रिपोर्ट भेजी जा चुकी है। उच्चस्तरीय अधिकारियों द्वारा इस्टीमेट स्वीकृत कर विभागीय खर्च से या जनप्रतिनिध निधि से गांव में बिजली पहुंच सकती है।