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कथा सिर्फ सुनें ही नहीं, अमल भी करें
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सफीपुर के भगवतीचरण वर्मा पार्क में सत्संग समारोह में प्रवचन करते दंडी स्वामी।
- फोटो : UNNAO
सफीपुर। भगवतीचरण वर्मा पार्क में चल रहे तीन दिवसीय 68वें सत्संग समारोह के दूसरे दिन आचरण की सुचिता पर जोर दिया। कहा गया कि कथा सिर्फ सुनें ही नहीं, अमल भी करें।
प्रतापगढ़ से आए स्वामी आनंदासनजी महराज ने कहा कि ब्रह्म सर्वत्र मौजूद है। उसको जानने के कई तरीके बताए जाते हैं लेकिन वह तो प्रत्येक जीव में विद्यमान है। खेद की बात है कि आज हम अपने को ही नहीं पहचान पा रहे हैं। जब तक हम समय और संबंधों से प्राप्त शक्ति का दुरुपयोग करते रहेंगे तब तक हम ब्रह्म को प्राप्त नहीं कर सकेंगे। इसके विपरीत संसार के अनेक दुख भोगने पड़ेंगे। मनुष्य की इच्छा पूर्ण नहीं होती है तो वह दुखी हो जाता है। आचार्य पुरुषोत्तम त्रिवेदी ने कहा कि ये जीवन धन्य है।
देवता भी इच्छा करते हैं कि उन्हें मानव जीवन मिले। अब कठिनाइयां उसके आचरण से उत्पन्न हो जाती हैं। व्यथा से पीड़ित मनुष्य कथा तो सुनते हैं किंतु अमल नहीं करते हैं। भगवान की कथा केवल वाणी का विषय नहीं होती। उसके तत्व को समझना और अपने जीवन में पालन करना जरूरी है। धनंजय मिश्र ने कहा कि भक्ति ही सुख की खान है। संसार की वस्तुओं में जहां लगाव और सुख दिखता है, वहां यथार्थ में सुख नहीं होता है। उपेंद्र शास्त्री ने भी आचरण की सुचिता पर बल दिया और कहा कि आचरण ही पूजनीय है। ये शरीर एक देवालय है। स्वामी रामस्वरूप ब्रम्हचारी ने जीवनदाता परमात्मा की भक्ति में सदैव तत्पर रहने का उपदेश दिया।
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प्रतापगढ़ से आए स्वामी आनंदासनजी महराज ने कहा कि ब्रह्म सर्वत्र मौजूद है। उसको जानने के कई तरीके बताए जाते हैं लेकिन वह तो प्रत्येक जीव में विद्यमान है। खेद की बात है कि आज हम अपने को ही नहीं पहचान पा रहे हैं। जब तक हम समय और संबंधों से प्राप्त शक्ति का दुरुपयोग करते रहेंगे तब तक हम ब्रह्म को प्राप्त नहीं कर सकेंगे। इसके विपरीत संसार के अनेक दुख भोगने पड़ेंगे। मनुष्य की इच्छा पूर्ण नहीं होती है तो वह दुखी हो जाता है। आचार्य पुरुषोत्तम त्रिवेदी ने कहा कि ये जीवन धन्य है।
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देवता भी इच्छा करते हैं कि उन्हें मानव जीवन मिले। अब कठिनाइयां उसके आचरण से उत्पन्न हो जाती हैं। व्यथा से पीड़ित मनुष्य कथा तो सुनते हैं किंतु अमल नहीं करते हैं। भगवान की कथा केवल वाणी का विषय नहीं होती। उसके तत्व को समझना और अपने जीवन में पालन करना जरूरी है। धनंजय मिश्र ने कहा कि भक्ति ही सुख की खान है। संसार की वस्तुओं में जहां लगाव और सुख दिखता है, वहां यथार्थ में सुख नहीं होता है। उपेंद्र शास्त्री ने भी आचरण की सुचिता पर बल दिया और कहा कि आचरण ही पूजनीय है। ये शरीर एक देवालय है। स्वामी रामस्वरूप ब्रम्हचारी ने जीवनदाता परमात्मा की भक्ति में सदैव तत्पर रहने का उपदेश दिया।
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