{"_id":"60be6cf08ebc3e6cca25a415","slug":"civic-unnao-news-knp632810135","type":"story","status":"publish","title_hn":"गोबर काष्ठ से अंतिम संस्कार का प्रयोग पंडों ने किया फेल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गोबर काष्ठ से अंतिम संस्कार का प्रयोग पंडों ने किया फेल
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उन्नाव। शहर के कल्याणी मोहल्ला निवासी रमाकांत दुबे ने गोबर काष्ठ उद्योग (गोबर के लकड़ीनुमा बोटे बनाना) लगाया है। वह राजस्थान की तरह यहां भी लकड़ी के बजाय गोबर काष्ठ का प्रयोग शवों के अंतिम संस्कार में करना चाहते थे, लेकिन पंडों ने यह प्रयोग सफल नहीं होने दिया। अब वह काष्ठ की आपूर्ति फैक्टरियों में करते हैं। यह फैक्टरियां इसका प्रयोग ईंधन के रूप में करती हैं।
रमाकांत दुबे ने पढ़ाई के दौरान जयपुर में गोबर से तैयार ईंधन का प्रयोग शवों के अंतिम संस्कार में होते देखा। उन्होंने जिले के शुक्लागंज, बक्सर व नानामऊ सहित अन्य श्मशान घाटों पर प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में शवों के दाह संस्कार में प्रयोग होने वाली लकड़ी के लिए पेड़ों की कटान रोकने के लिए गोबर काष्ठ उद्योग लगाने का संकल्प लिया। खादी ग्रामोद्योग की मदद और बैंक से वित्तीय सहायता से कुल 20 लाख रुपये से उद्योग लगाया। उत्पाद तैयार कर श्मशान घाटों तक पहुंचाने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो पाए।
उन्होंने बताया कि पंडों ने लोगों को गोबर काष्ठ से अंतिम संस्कार करने में रोड़े लगा दिए। इसलिए जयपुर की तरह यह प्रयोग यहां सफल नहीं हो सका। तीन श्रमिक एक दिन में एक मशीन से 20-25 क्विंटल गोबर काष्ठ तैयार कर लेते हैं। एक ट्रैक्टर-ट्राली गोबर एक हजार रुपये में मिलता है। पनकी की एक औद्योगिक इकाई को 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से आपूर्ति करते हैं। यह इकाई ब्वायलर में ईंधन के रूप में इसका प्रयोग करती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
रमाकांत दुबे ने पढ़ाई के दौरान जयपुर में गोबर से तैयार ईंधन का प्रयोग शवों के अंतिम संस्कार में होते देखा। उन्होंने जिले के शुक्लागंज, बक्सर व नानामऊ सहित अन्य श्मशान घाटों पर प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में शवों के दाह संस्कार में प्रयोग होने वाली लकड़ी के लिए पेड़ों की कटान रोकने के लिए गोबर काष्ठ उद्योग लगाने का संकल्प लिया। खादी ग्रामोद्योग की मदद और बैंक से वित्तीय सहायता से कुल 20 लाख रुपये से उद्योग लगाया। उत्पाद तैयार कर श्मशान घाटों तक पहुंचाने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो पाए।
विज्ञापन
उन्होंने बताया कि पंडों ने लोगों को गोबर काष्ठ से अंतिम संस्कार करने में रोड़े लगा दिए। इसलिए जयपुर की तरह यह प्रयोग यहां सफल नहीं हो सका। तीन श्रमिक एक दिन में एक मशीन से 20-25 क्विंटल गोबर काष्ठ तैयार कर लेते हैं। एक ट्रैक्टर-ट्राली गोबर एक हजार रुपये में मिलता है। पनकी की एक औद्योगिक इकाई को 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से आपूर्ति करते हैं। यह इकाई ब्वायलर में ईंधन के रूप में इसका प्रयोग करती है।
विज्ञापन