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बंजर नहीं होगी साहित्य की उर्वरा भूमि
Unnao
Updated Mon, 20 Oct 2014 05:32 AM IST
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उन्नाव। साहित्य की भूमि बहुत उर्वरा है। यह कभी बंजर नहीं होगी। फूहड़पन और अश्लीलता का समावेश होने से इसका अर्थ भी बदला है। यह सही है कि साहित्यकारों को श्रोताओं और पाठकों की मांग के अनुसार बदलना चाहिए लेकिन प्रतिस्पर्धा की इस भागदौड़ में साहित्य के मूल को बचाना भी हमारा ही दायित्व है।
2011 में राजस्थान सरकार द्वारा अपने चर्चित संग्रह ‘फैली-फैली धूप है’ के लिए पुरस्कृत हो चुके जयपुर के प्रसिद्ध कवि बनज कुमार बनज से अमर उजाला रिपोर्टर ने जब बातचीत की तो उनका दर्द छलक उठा। साहित्य की स्थिति पर उन्होंने बेबाकी से टिप्पणी की और कहा कि नए युग के कवियों व रचनाकारों ने अगर सबक नहीं लिया तो साहित्य को नुकसान उठाना पड़ेगा। बताया कि कविता दर्शन, अध्यात्म और शृंगार की त्रिवेणी है। पहले लोग उपन्यास, दोहे पढ़ते थे जो दिल को अंदर तक छूत जाते थे लेकिन आज के युग में ऐसा रचनाकार नहीं है जिनकी रचनाएं दिल को छू जाएं। आज के साहित्यकार फैशन के तौर पर लिखकर जल्दी से प्रसिद्धि पाना चाहते हैं। आज का श्रोता अच्छी रचना सुनना चाहता है परंतु आमतौर पर कवि उसको पूरा नहीं पा रहे हैं। कवियों की उर्वरा भूमि बंजर नहीं होगी। वर्ष 1990 से 2005 तक का समय साहित्य के क्षेत्र में सबसे कठिन था इस समय साहित्य को सुनने व पढ़ने वाले श्रोता इस क्षेत्र से कटे हुए थे। कवि बनज कुमार बनज मंचों के साथ ही सब टीवी, दबंग टीवी और जी टीवी पर कवि सम्मेलन कर चुके है। उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में कवि सम्मेलन के नाम चुटकुले हो रहे हैं। यह ज्यादा प्रसिद्धि पाने के कुछ कवि श्रोताओं का ब्रेनवास कर रहे हैं जो चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि केंद्र की पिछली यूपीए सरकार ने संसद के अंतिम सत्र के दौरान कार्पोरेट सेक्टर का दो प्रतिशत धन सोशल एक्टिविटी में में लगाने का ऐलान किया था जो बहुत अच्छा कार्य है। इसका प्रभाव अभी नही दिख रहा है परंतु कुछ समय बाद दिखाई देखा। साहित्य के क्षेत्र में लोगों की रुचि बढ़ रही है।
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2011 में राजस्थान सरकार द्वारा अपने चर्चित संग्रह ‘फैली-फैली धूप है’ के लिए पुरस्कृत हो चुके जयपुर के प्रसिद्ध कवि बनज कुमार बनज से अमर उजाला रिपोर्टर ने जब बातचीत की तो उनका दर्द छलक उठा। साहित्य की स्थिति पर उन्होंने बेबाकी से टिप्पणी की और कहा कि नए युग के कवियों व रचनाकारों ने अगर सबक नहीं लिया तो साहित्य को नुकसान उठाना पड़ेगा। बताया कि कविता दर्शन, अध्यात्म और शृंगार की त्रिवेणी है। पहले लोग उपन्यास, दोहे पढ़ते थे जो दिल को अंदर तक छूत जाते थे लेकिन आज के युग में ऐसा रचनाकार नहीं है जिनकी रचनाएं दिल को छू जाएं। आज के साहित्यकार फैशन के तौर पर लिखकर जल्दी से प्रसिद्धि पाना चाहते हैं। आज का श्रोता अच्छी रचना सुनना चाहता है परंतु आमतौर पर कवि उसको पूरा नहीं पा रहे हैं। कवियों की उर्वरा भूमि बंजर नहीं होगी। वर्ष 1990 से 2005 तक का समय साहित्य के क्षेत्र में सबसे कठिन था इस समय साहित्य को सुनने व पढ़ने वाले श्रोता इस क्षेत्र से कटे हुए थे। कवि बनज कुमार बनज मंचों के साथ ही सब टीवी, दबंग टीवी और जी टीवी पर कवि सम्मेलन कर चुके है। उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में कवि सम्मेलन के नाम चुटकुले हो रहे हैं। यह ज्यादा प्रसिद्धि पाने के कुछ कवि श्रोताओं का ब्रेनवास कर रहे हैं जो चिंता का विषय है।
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उन्होंने कहा कि केंद्र की पिछली यूपीए सरकार ने संसद के अंतिम सत्र के दौरान कार्पोरेट सेक्टर का दो प्रतिशत धन सोशल एक्टिविटी में में लगाने का ऐलान किया था जो बहुत अच्छा कार्य है। इसका प्रभाव अभी नही दिख रहा है परंतु कुछ समय बाद दिखाई देखा। साहित्य के क्षेत्र में लोगों की रुचि बढ़ रही है।
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